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पिता के निर्णय ने दिलाया पद्म भूषण

7 वर्ष पहले
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प्रीति शर्मा जैन भोपाल
‘अगर पिता ने मुझे अपने संगीत के आकाश के तले न लिया होता तो मैं पद्मश्री या पद्मभूषण के बारे में सोच भी नहीं सकता था। यह कहना है,चेन्नई में रहने वाले चतुर घटम समर्पणम वादक विक्कू विनायकरम का।’ साल 2002 में पद्मश्री और हाल में ही उन्हें पद्म भूषण देने की घोषणा की गई। 73 वर्षीय विक्कू अपने पिता टीआर हरिहरन शर्मा के 60 साल पहले लिए निर्णय को याद करते हुए बताते हैं, ‘मैं स्कूल में पढ़ाई कर रहा था और संगीत की शिक्षा भी ले रहा था, लेकिन लगातार स्कूल में मेरा प्रदर्शन गिरता जा रहा था। मेरे पिता ने कहा कि तुम्हें आगे पढऩे की बजाए संगीत में ही अपना जीवन तलाशना चाहिए, क्योंकि तुम इसमें बहुत बेहतर हो। मैंने भी बिना किसी विरोध के पिताजी के निर्णय का स्वीकार किया क्योंकि मैं भी संगीत के प्रति गहरा लगाव रखता था। लेकिन रास्ता बहुत आसान नहीं था। पिता ने कहा कि मैं तुम्हें सिर्फ एक साल प्रशिक्षण दूंगा। मेरे पिता मोरसिंह नाम का वाद्ययंत्र बजाते थे, लेकिन एक दुर्घटना में उनकी एक अंगुली कट गई जिसके बाद वो मोरसिंह बजाने में असक्षम हो गए। पारिवारिक की आर्थिक स्थिति बिगडऩे लगी और फिर मैंने स्टेज परफॉर्मेंस देना शुरू किया, क्योंकि परिवार में मैं ही बड़ा बेटा था। अपनी पहली प्रस्तुति 13 साल की उम्र में दी थी।’



ग्रैमी अवॉर्ड पाने वाले पहले दक्षिण भारतीय

‘पिता के साथ सिर्फ एक साल की कठिन और घोर संगीत तपस्या के बाद मैंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। घटम वादन दक्षिण भारत में सालों के किया जाने वाला वादन है, इसलिए उन्होंने मेरे लिए यह वादन चुना। 24 में से कभी 18 तो कभी 20 घंटे तक मुझे घटम वादन की शिक्षा दी जाने लगी। सिर्फ नित्य कर्म और भोजन के लिए ही उठने की छूट मिलती थी। 11 साल की उम्र में पिता के सानिध्य में ऐसा संगीत सीखना ईश्वर का आर्शीवाद ही थी। मैं 1991 में पहला दक्षिण भारतीय कलाकार बना जिसे ग्रैमी अवॉर्ड मिला। मैं एक साथ चार मिट्टी के घड़ों पर रिद्म प्रस्तुत करने वाला अकेला हूं।’

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पहले पद्मश्री और इस साल पद्म भूषण से सम्मानित होने वाले चतुर घटम ((चार घड़े)) समर्पणम वादक विक्कू विनायकरम ने बताया कि उनके पिता ने 60 साल पहले पढ़ाई के बजाए संगीत में रुझान देखा और इसी क्षेत्र में उन्हें करियर बनाने की सलाह दी।