आंधी से कोई कह दे औकात में रहे
सिटी रिपोर्टर ग्वालियर
‘सूरज सितारे चांद मेरे साथ में रहे, जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे। साखों से टूट जाएं वो पत्ते नहीं हैं हम, आंधी से कोई कह दे औकात में रहे...। यह अंदाज है शायर राहत इंदौरी की फनकारी का। ग्वालियर मेला के फैसिलिटेशन सेंटर में आयोजित अखिल भारतीय मुशायरे में उन्होंने इसी अंदाज में अपनी शायरी की शुरूआत की। इस सिलसिले को परवान चढ़ाते हुए उन्होंने एक से बढ़कर एक गजलें और अशआर पेश किए। एक शेर देखें- आग के पास कभी मोम को लाकर देखूं, हो इजाजत तो तुझे हाथ लगाकर देखूं। दिल का मंदिर बड़ा वीरान नजर आता है, सोचता हूं तेरी तस्वीर लगाकर देखूं।
मुशायरे में नोएडा के मलिकजादा जावेद के तेवर यूं रहे- ‘हवा को बरगलाना चाहते हैं, दिए को सब बुझाना चाहते हैं। बुलंदी पर सुना है पांव वाले, अपाहिज को बिठाना चाहते हैं। कानपुर से प्रमोद तिवारी ने शेर सुनाया कि ‘पूछता नहीं कुछ भी आके बैठ जाता है चांद मेरे आंगन में, ये तो गुंडागर्दी है। एक तो नहीं हैं वो पास मेरे, ऊपर से चांदनी में शोले हैं। शरीफ भारती ने कहा- सीखा है जो विदेश में सबको बताएंगे, नेता हमारे कूड़े से बिजली बनाएंगे। कूड़ा बहुत हमारे भी भेजे में है भरा, अब देखना हमारे भी घर जगमगाएंगे। मदनमोहन दानिश का अंदाज देखें- माली चाहे कितना भी चौकन्ना हो, फूल और तितली में रिश्ता हो जाता है, भोपाल की नुसरत मेहंदी ने कहा- इससे पहले के दास्तां हो जाऊ, अपने लफ्जों में खुद बयां हो जाऊ..।
हर मंच बना यादगार
यादगार पल- जिंदगी का हर लम्हा यादगार है। शायरी की शुरूआत अंतर्मन से हुई। दुनिया की हर चीज से प्रेरणा मिली और हम शायरी करते चले गए। हर मंच हमारे लिए यादगार है। - मंसूर उस्मानी
पहचान:चाहें दिल ही जले रोशनी के लिए, हमसफर चाहिए जिंदगी के लिए।
दोस्त की देखा-देखी बना शायर
यादगार पल- घर में शायराना माहौल था, लेकिन हम उसे हल्के में लेते थे। एक बार मुशायरे में हमारे दोस्त नजर एटवी ने ऐसी शायरी सुनाई, कि वहीं से हमारा शायरी का कारवां शुरू हो गया। - अज्म शाकिरी
पहचान: जिंदगी यूं भी गुजारी जा रही है, जैसे कोई जंग हारी जा रही है।
मुशायरे से मिली जीवनसंगिनी
यादगार पल- आज से आठ साल पहले में एक मंच पर मुशायरे में प्रस्तुति दे रहा था। उस समय मेरी मुलाकात एक लड़की से हुई। वहीं से इश्क परवान चढ़ा और उसी से शादी हो गई। - अबरार काशिफ
पहचान:वो तो अच्छा है गजल तेरा सहारा है मुझे, वरना फिक्रो ने तो बस घेर कर मारा है मुझे।
मंच पर ही लिखी गजल
यादगार पल- हमारे गांव के पास मीरगंज में मुशायरा था। वहां हमें एक लाइन दी गई कि उसी पर लिखना है और उसी को पढऩा है। जब हमने उस लाइन पर शेर सुनाया। तो लोगों से खूब वाहवाही मिली। -अकील नोमानी
पहचान:बस इसी बात का अहसास मुझे मार गया, मुझसे एक जेल में दानिस्ता कोई हार गया।
बिपाशा का थामा हाथ
यादगार पल- मदहोशी फिल्म के सेट पर बिपाशा बासू को की कोहनी में कोई चीज चुभ गई। जॉन अब्राहिम और हमने, बिपाशा का हाथ पकड़कर देखा कहीं लगी तो नहीं। तब मुझे नहीं पता था वो एक्ट्रेस है। - शकील आजमी
पहचान: अब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है, कि लोग नंगे हो जाते हैं खबर के लिए।
फिल्मों ने दिलाई पहचान
यादगार पल- 1971 में देवास में पहली मर्तबा अपनी शायरी सुनाई,लेकिन कच्चेपन की वजह से अनुभव ठीक नहीं रहा। उस समय न तो दोस्तों ने हौंसला अफजाई की और न ही ऑडियंस ने। - राहत इंदौरी
पहचान:मिशन कश्मीर फिल्म का गीत बुमरो बुमरो श्याम रंग बुमरो...।
 ग्वालियर व्यापार मेले के फैसिलिटेशन सेंटर में अखिल भारतीय मुशायरे को सुनते शहरवासी। फोटो: भास्कर