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- 90 के दशक से चल रहा है पीएमटी फर्जीवाड़ाफर्जीवाड़े को लगातार अपग्रेड करते रहे आरोपी, एक डॉक्टर का म
90 के दशक से चल रहा है पीएमटी फर्जीवाड़ाफर्जीवाड़े को लगातार अपग्रेड करते रहे आरोपी, एक डॉक्टर का मर्डर भी हुआ था१९९२ में ही हो गया था पेपर लीक करने वाले रैकेट का खुलासा, दो को हुई थी जेल
ग्वालियर।
पीएमटी में फर्जीवाड़े की शुरुआत 90 के दशक के पहले ही ग्वालियर में हो चुकी थी। शुरुआती सालों में रैकेट दो लाख रुपए लेकर व्यापमं के सहयोग से टेस्ट के दौरान परीक्षार्थी के आस-पास मेडिकल स्टूडेंट या युवा डॉक्टर की सिटिंग कराकर उसे पेपर सॉल्व करवाता था। हालांकि, १९९१-९२ में ही पीएमटी पेपर आउट कांड का खुलासा हो गया था। इसमें जेएएच के एनाटॉमी विभाग के डॉक्टर जीपीएस गौर व प्रशासनिक अधिकारी डॉ. शाक्य की गिरफ्तारी हुई और जेल भेजा गया। डॉ. गौर के साथ उनका करीबी छात्र डॉ. जगदीश सगर ((फिलहाल इंदौर जेल में बंद)) रहता था। जेल से छूटने के बाद डॉ. गौर की 1994-95 में मालनपुर के पास हत्या कर दी गई। इससे पहले उनके भतीजे की भी हत्या कर दी गई थी।
ऐसे अपग्रेड होता गया फर्जीवाड़ा-
1991-
सहयोगी छात्र को टेस्ट में बैठाने के साथ ही पेपर आउट कराया जाता था।
199४-9५ - डॉ. गौर की हत्या के बाद डॉ. सगर ने व्यापमं में डॉ. गौर के खास लोगों से संपर्क बढ़ा लिए और पेपर आउट कराने लगा। आउट पेपर लेने के लिए डील लगभग एक माह पहले होती थी। पेपर खरीदने के इच्छुक छात्र कोचिंगों से ढूंढ़े जाते थे। इसमें कुछ कोचिंग के संचालक भी शामिल रहते थे।
- डॉ.सगर के साथ ही एक अन्य युवक भी इस रैकेट में जुड़ा गया। शादी के बाद इसकी पुलिस अधिकारियों से रिश्तेदारी हुई, जिसका रैकेट फायदा उठाने लगा। इन दोनों ने ही शुरुआत में अपने रिश्तेदारों को पीएमटी में सिलेक्ट कराया।
-पेपर आउट कराने में जब परेशानी आने लगी तो फर्जी छात्रों को टेस्ट में बैठाया जाने लगा। इन्हें दूसरे राज्यों से बुलाया जाता था।
पीजी में भी फर्जीवाड़ा:
फर्जी तरीके से पास हुए छात्र जब एमबीबीएस में लगातार असफल होने लगे तो इस रैकेट ने एमबीबीएस व प्रीपीजी में भी फर्जीवाड़ा शुरू कर दिया। इन परीक्षाओं में नकल कराकर व किसी अन्य से कॉपी लिखवाई जाती थी।
दस्तावेज नष्ट कराकर बचा एक रैकेट:
फर्जी छात्रों के दस्तावेज का रिकॉर्ड नष्ट कराकर एक बड़ा रैकेट अब भी कार्रवाई से बचा है। इन फर्जी छात्र-छात्राओं के परिजन पुलिस व बड़े प्रशासनिक पदों पर बैठे हुए हैं। दस्तावेज नष्ट कराने में लाखों रुपए खर्च किए गए हैं। हालांकि, व्यापमं के रिकॉर्ड नष्ट करने वाले अफसरों के खिलाफ कार्रवाई होने पर यह रैकेट भी पकड़ा जा सकता है, लेकिन प्रभावशाली इस कार्रवाई को रोके हुए हैं।
कृषि विस्तार अधिकारी का बेटा पकड़ा
इलाहबाद से आते थे पेपर हल करने वाले
पुलिस ने दो दिन पहले संदीप लहारिया और देशराज गुर्जर को गिरफ्तार किया था। इन दोनों ने बताया कि इन्होंने विशाल यादव और चांद खां के जरिए मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया था। विशाल ने पुलिस को बताया कि इलाहबाद के दो युवक पेपर हल करने के लिए फर्जी परीक्षार्थियों को भेजते थे। एसटीएफ को इनसे पूछताछ में पता चला कि जीआरएमसी की जांच कमेटी ने बेकसूर छात्रों को भी संदिग्ध छात्रों की सूची में शामिल कर रखा है। पुलिस ने गिरफ्तार छात्र व उनके रिश्तेदारों की परीक्षा की कॉपियां जेयू से मांगी हैं।
पहले पकड़ा जा चुका है चांद खां: पीएमटी के पेपर लीक करने के संदेह में चांद खां को दो साल पहले कंपू थाना पुलिस ने पकड़ा था। इसके पास जो पेपर था, उसके प्रश्न मूल पेपर से अलग थे, इसलिए छोड़ दिया गया। एमबीबीएस के फस्र्ट प्रोफ में ही वह फेल हो गया था। वह पोरसा का रहने वाला है, वहीं पर उसकी मां नर्स है। झांसी में भी इसके कुछ करीबी लोगों के यहां पुलिस दबिश देने गई है।
ग्वालियर. जीआरएमसी में फर्जी तरीके से प्रवेश पाने वाले एक और छात्र रायसिंह जाटव ((चौरसिया)) को पुलिस ने गोला का मंदिर थाना क्षेत्र के पंचशील नगर से गिरफ्तार करना बता दिया। वह कृषि विस्तार अधिकारी सूरतराम का बेटा है और मूल रूप से चंदोखर भिंड का रहने वाला है। इसने अपने रिश्तेदार अरविंद जाटव ((बिरखड़ी- गोहद)) के माध्यम से साढ़े तीन लाख रुपए में पीएमटी दिए बिना एमबीबीएस में प्रवेश पा लिया था। अरविंद महू, इंदौर में वेटरनरी कॉलेज में पढ़ रहा है। दोनों छात्र 2007 से 2010 तक मुनीष गुप्ता की कोचिंग में पढ़ते थे। रायसिंह ने पुलिस को बताया कि उसे नहीं मालूम कि उसकी जगह कौन परीक्षा में बैठा और परीक्षा केंद्र कौनसा था। वह तो सीधे काउंसिलिंग में पहुंचा था। उसने पुलिस को मेडिकल कॉलेज के दो छात्र और कुछ कर्मचारियों के नाम भी बताए हैं। पुलिस अब इनकी तलाश कर रही है। इस मामले के तार भी डॉ. सगर से जुड़ रहे हैं। उधर भोपाल में शनिवार को डीएमई डॉ. एसएस कुशवाह से मिलने पहुंचे संदिग्ध छात्रों की जांच करने वाली कमेटी के सदस्यों से उन्होंने कहा कि वे जांच की विस्तृत रिपोर्ट डीन डॉ.जीएस पटेल के हस्ताक्षर के साथ भेजें।
एक रैकेट अब भी बचा : फर्जी छात्रों के दस्तावेज का रिकॉर्ड नष्ट कराकर एक बड़ा रैकेट अब भी कार्रवाई से बचा है। इन फर्जी छात्र-छात्राओं के परिजन पुलिस व बड़े प्रशासनिक पदों पर बैठे हुए हैं, जो कार्रवाई से रैकेट को बचा रहे हैं।
ऐसे अपग्रेड होता गया फर्जीवाड़ा
1991 में सहयोगी छात्र को टेस्ट में बैठाने के साथ ही पेपर आउट कराया जाता था। 199४-9५ में डॉ. गौर की हत्या के बाद डॉ. सगर ने व्यापमं में संपर्क बढ़ाए और पेपर आउट कराने लगा। पेपर खरीदने के इच्छुक छात्र कोचिंग्स से ढूंढे जाते थे। इसमें कुछ कोचिंग संचालक भी शामिल थे। डॉ.सगर के साथ ही एक अन्य युवक भी इस रैकेट में जुड़ गया। शादी के बाद इसकी पुलिस अधिकारियों से रिश्तेदारी हुई, जिसका रैकेट ने फायदा उठाया। पेपर आउट कराने में जब परेशानी हुई तो दूसरे राज्यों से लाकर फर्जी छात्रों को टेस्ट में बैठाया जाने लगा। रैकेट एमबीबीएस और पीजी परीक्षाओं में भी छात्रों को फर्जी तरीके से पास करता था।
नगर संवाददाता. ग्वालियर
प्रदेश में इस समय चर्चित पीएमटी घोटाले का खुलासा ग्वालियर में १९९१-९२ में ही हो चुका था। उस समय पेपर आउट कराने पर जेएएच के एनाटॉमी विभाग के डॉ. जीपीएस गौर व प्रशासनिक अधिकारी डॉ. शाक्य को जेल भेजा गया था। डॉ. गौर के साथ उनका करीबी छात्र डॉ. जगदीश सगर ((फिलहाल इंदौर जेल में बंद)) रहता था। डॉ. गौर की 1994-95 में मालनपुर के पास हत्या हो गई। हत्या के आरोपियों ने पुलिस को बताया था कि उनका पीएमटी पेपर आउट कराने और टोल टैक्स बेरियर के पैमेंट को लेकर डॉ. गौर से विवाद चल रहा था। शुरुआती सालों में रैकेट दो लाख रुपए लेकर टेस्ट के दौरान परीक्षार्थी के आस-पास मेडिकल स्टूडेंट या युवा डॉक्टर की सिटिंग कराकर उसे पेपर सॉल्व करवाता था।
पीएमटी घोटाले में हो चुका है डॉक्टर का मर्डर
रायसिंह जाटव