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लौह तरंग : प्राचीन विधा को जीवित रखने का प्रयास
चंदन व्यास - बड़वानी
विलुप्त हो रही भारत की प्राचीन विधा लौह तरंग को खरगोन जिले के सनावद में जीवित रखने के प्रयास जारी है। खरगोन जिले में ही यह विधा जीवित है। परंपरा के रूप में सनावद निवासी धरमचंद निमाड़े 25 साल से इसे सहेजने में जुटे हुए हैं। आधुनिक संगीत व वजनदार होने से यह विलुप्ता की कगार पर पहुंच गई है। रविवार को भारत पर्व कार्यक्रम में प्रस्तुति देने शहर आए श्री निमाड़े से भास्कर ने विशेष चर्चा की। उन्होंने कहा इस विधा के इतिहास को लेकर उन्हें अधिक जानकारी नहीं है। यह विधा 100 से अधिक साल पुरानी है। उधर, इस विधा के संरक्षण के लिए शहर के उत्कृष्ट विद्यालय के विद्यार्थी एवं सामाजिक संगठन के सदस्य मुख्यमंत्री को पोस्टकार्ड एवं पत्र भेजेंगे। वे इसे आगे भी कायम रखने की मांग करेंगे।
लोक धुन के साथ राग पर निर्मित गीतों की प्रस्तुति
श्री निमाड़े ने कहा लौह तरंग पर निमाड़ी व गरबी लोक धुन बजाई जा सकती है। साथ ही राग मालकोंस, भोपाली, दरबारी, यमन, केदार राग बजाए जा सकते हैं।
इन शहरों में दी प्रस्तुति, अटलजी ने की थी सराहना
श्री निमाड़े अब तक महाराष्ट्र, गुजरात, पूना, हैदाराबाद, औरंगाबाद, नई दिल्ली, कोलकाता सहित कई बड़े शहरों में प्रस्तुति दे चुके हैं। उन्होंने एक कार्यक्रम में प्रस्तुति देने जाने के लिए सोमवार को केरल रवाना होने की बात कही। नई दिल्ली में सन् 2000 में हुई रोजा-इफ्तार पार्टी में अटलबिहारी वाजपेयी, अरूण जेटली, लालकृष्ण आडवाणी सहित दिग्गज नेताओं के समक्ष प्रस्तुति दी थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने इस वाद्य यंत्र की सराहना की थी।
मुख्यमंत्री को लिखेंगे पत्र, रखेंगे अपनी बात
इस विधा को जीवित रखने के लिए शहर से शैक्षणिक संस्था व सामाजिक संस्थाओं द्वारा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को पोस्टकार्ड लिखे जाएंगे। शासकीय उत्कृष्ट उमावि की प्राचार्य मनीषा गौतम ने कहा लौह तरंग विधा को बचाने के लिए स्कूल के विद्यार्थियों से श्री चौहान को पत्र लिखे जाएंगे। रोटरी क्लब के अध्यक्ष डॉ. आरसी चोयल एवं सचिव अजीत जैन, रोटरेक्ट क्लब के अध्यक्ष चेतन गुप्ता एवं सचिव विपुल चतुर्वेदी ने भी शहरवासियों के माध्यम से पोस्टकार्ड लिखवाने की बात कही।
खरगोन जिले में जीवित है विधा, देश के बड़े-बड़े शहरों में प्रस्तुति दे चुके हैं धरमचंद निमाड़े
धरमचंद निमाड़े
विधा क्यों हो रही विलुप्त
लोहे की प्लेट्स का वजन 8 किलो है। वजनदार होने से इसे कहीं भी लाने-ले-जाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। श्री निमाड़े ने कहा समय के साथ वाद्ययंत्रों में बढ़ती आधुनिकता भी इसके विलुप्त होने का प्रमुख कारण है। आधुनिक डीजे साउंड की गूंज में भी इसकी मधुर धुन गुम हो रही है।
यह है
लौह तरंग
लौह तरंग वाद्य यंत्र में लोहे की 24 प्लेट होती है। 24 प्लेट्स को स्टैंड पर लगाकर लकड़ी की हथौड़ी से बजाया जाता है। इसे बजाने पर निकलने वाले संगीत के लिए अलग से माइक सेट लगाने की भी जरूरत नहीं होती।