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तिब्बत की आजादी के लिए जारी रहेगा अहिंसक और शांतिप्रिय आंदोलन : नारबू
भास्कर संवाददाता - दमोह
चीन के कब्जे वाले देश तिब्बत की निर्वासित सरकार के सेटलमेंट ऑफिसर कालदिन नारबू मंगलवार को दमोह जिले के दौरे पर आए। उन्होंने मीडिया से चर्चा कर तिब्बत की आजादी के लिए चलाए जा रहे आंदोलन से लेकर तिब्बतियों के पुनर्वास के संबंध में बताया। मप्र और छग में तिब्बतियों के पुनर्वास और आजीविका के लिए काम करने वाले श्री नारबू यहां समाजसेवी संतोष भारती द्वारा शरणार्थी तिब्बतियों के पुनर्वास के लिए दी जा रही पांच एकड़ जमीन का निरीक्षण और उनके पुनर्वास की संभावनाएं तलाशने आए थे। श्री नारबू अपनी सरकार के प्लानिंग ऑफिसर को दमोह की रिपोर्ट देंगे। इसके बाद ही यहां तिब्बतियों के पुनर्वास को लेकर आगे की योजना पर काम होगा।
उन्होंने कहा कि 1958-59 में चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जा करके वहां के लोगों को प्रताडि़त किए जाने के कारण करीब शांतिप्रिय देश की आबादी को भारत सहित दुनिया के अन्य राष्ट्रों में शरण लेनी पड़ी। भारत और अन्य देशों में तिब्बत की करीब 1 लाख 20 हजार की आबादी शरणार्थी बनकर रह रही है। भारत-तिब्बती मैत्री संघ के माध्यम से तिब्बत की निर्वासित सरकार अपने देश की आजादी के लिए आज भी शांतिप्रिय और अहिंसक आंदोलन चला रही है। श्री नारबू ने बताया कि अपने देश को चीन की अधीनता से मुक्त कराने के लिए उनका अहिंसक आंदोलन सतत चल रहा है। तिब्बत दुनिया का सबसे अधिक शांति प्रिय और संप्रभुता संपन्न राष्ट्र था, जिसे चीन ने हड़प लिया। उन्होंने कहा कि यदि तिब्बत आज चीन के कब्जे में नहीं होता तो भारत को वॉर्डर पर इतनी ज्यादा सेना लगाने की कभी जरूरत नहीं पड़ती और न ही भारत के लिए चीन इतनी बड़ी समस्या बनता।
निर्वासित हैं पर अब भी बनती है संवैधानिक सरकार
तिब्बत पर चीन का कब्जा होने के बाद भी भले ही वहां के लोग भारत में निर्वासित बनकर रह रहे हैं, लेकिन वे अब भी संवैधानिक व्यवस्थाओं और मर्यादाओं का पालन करते आ रहे हैं। देश नहीं होने के बाद भी उनकी सरकार है और संसद सदस्य से लेकर पूरे व्यवस्था एक देश की ही तरह चलती हैं।
श्री नारबू ने बताया कि तिब्बत की निर्वासित सरकार का मुख्यालय धर्मशाला में है। जहां से उनकी सरकार देश की आजादी के लिए सीटीए के सूत्र पर पूरा आंदोलन चला रही है। चूंकि तिब्बती भारत में शरण लेकर रह रहे हैं इसलिए यहां वे अपने देश का प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति व अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के नाम घोषित नहीं करते क्योंकि एक राष्ट्र में दो विधान, दो प्रधान और दो संविधान नहीं होना चाहिए इसलिए आंतरिक रूप से शासन व्यवस्था का पूरा तंत्र एक देश की तरह काम कर रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि तिब्बत के लोगों के दिलों में पिछले 50 सालों से आजादी के लिए एक ज्वाला धधक रही है बावजूद सभी अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही आजादी चाहते हैं।
दमोह आए तिब्बत की निर्वासित सरकार के सेटलमेंट ऑफीसर। ((हाथ में दस्तावेज लिए))
तिब्बत की निर्वासित सरकार के मप्र-छग सेटलमेंट ऑफिसर ने किया दमोह का दौरा