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मनरेगा में काम नहीं कर रहे मजदूर, गांव का विकास ठप, कर्मचारियों का वेतन रुका

7 वर्ष पहले
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यदि एक पंचायत में एक माह में एक लाख रुपए का काम नहीं तो रोजगार सहायकों को नहीं मिलेगा मानदेय। रोजगार सहायक बोले- ई-पेमेंट के जरिए मजदूरों के भुगतान में भी होती है देरी।
भास्कर संवाददाता - दतिया
जिले में मनरेगा का काम करने में ग्रामीण क्षेत्र के मजदूर रुचि नहीं ले रहे हैं। इससे मनरेगा का काम पिछड़ रहा है। वहीं मजदूरों को काम करने के बाद देरी से पैसे मिलना और बाजार में अधिक मजदूरी मिलने से ग्रामीण क्षेत्र में लोगों की परेशानियों का कारण बन रहा है। अधिकांश मजदूर गांव छोड़कर शहर में मजदूरी करने के लिए आ रहे हैं। मजदूर न मिलने के कारण जिले में सरकारी योजनाओं को पलीता लग रहा है।
मालूम हो कि गांव में रहने वाले मजदूर वहीं पर काम करें इसके लिए संचालित महात्मागांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी योजना के तहत योजनाओं के तहत काम शुरु किया गया। इसमें मजदूर काम नहीं कर रहे हैं। वे गांव छोड़कर शहर में काम करने के लिए आ रहे हैं। इससे ग्राम पंचायत स्तर पर मनरेगा का काम नहीं किया जा रहा है। इससे गांव में विकास के काम भी नहीं हो पा रहे हैं।
मिलती है अधिक मजदूरी
गांव में मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों को १४६ रुपए का भ्ुागतान किया जाता है। वहीं बाजार में मजदूरी करने पर २०० रुपए से २५० रुपए तक का भुगतान किया जाता है। अधिक मजदूरी मिलने के कारण मजदूर परिवार गांव में मजदूरी नहीं कर रहे हैं। अधिकांश परिवार गांव छोड़कर शहर आकर रह रहे हैं।




इन ग्राम पंचायतों में नहीं हुआ काम

दतिया तहसील की महेबा और जिगना ग्राम पंचायत में मनरेगा के तहत काम नहीं किया गया। यह स्थिति जिले के तीनों तहसीलों में कई पंचायतें ऐसी है जहां पर मनरेगा के तहत काम नहीं किया जा रहा है।



क्यों हो रही भुगतान में देरी

ञ्च ई पेमेंट से किया जाता है भुगतान।

ञ्च मजदूरों के खाते पोस्ट आफिस में खुले हैं।

ञ्च एक महीने से अधिक का समय लगता है भुगतान में।

ञ्च तीन स्टेप में जनपद कार्यालय को भेजी जाती है भुगतान की जानकारी।



यह हो रही है परेशानी

ञ्च सरकारी काम में देरी से होता है मजदूरी का भुगतान।

ञ्च गरीब परिवारों को तुरंत चाहिए रहती है मजदूरी।

ञ्च धीमी गति से हो रहा पंचायत स्तर पर विकास कार्य।

ञ्च पंचायत कर्मचारी भी हो रहे परेशान।



दतिया। जिला पंचायत कार्यालय का फाइल फोटो।

नहीं मिलती मजदूरी

॥गांव में काम करने के बाद कई दिनों तक मजदूरी नहीं मिलती है। सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाते रहो। इससे अच्छा है कि शहर में मजदूरी करो वहां तुरंत मजदूरी मिल जाती है। मनरेगा की मजदूरी से अधिक मजदूरी बाजार में मिलती है।ञ्जञ्ज

छुटकू कोरी, मजदूर

॥मनरेगा के तहत काम करने से अच्छा है बाजार में मजदूरी करें। सरकारी मजदूरी के भुगतान में देरी होती है। इससे परिवार के पालन पोषण में परेशानी होती है। शहर में ही काम जल्दी मिल जाता है।ञ्जञ्ज

रामाबाई, मजदूर

॥काम के लिए मजदूर तो मिलते हैं। लेकिन कम रेट होने के कारण शहर चले जाते है। साथ ही भुगतान में देरी होती है। मजदूरों को तुरंत मजदूरी चाहिए होती है।ञ्जञ्ज

भावना दांगी, सरपंच ग्राम पंचायत बहादुरपुर

कोशिश कर रहे हैं

॥सरकार की योजनाओं की जानकारी अधिक से अधिक ग्रामीण और मजदूरों को दी जानी चाहिए। मजदूरी के भुगतान में देरी न हो इसके लिए कोशिश की जा रही है। जो भी स्थिति हो वह बताई जानी चाहिए।ञ्जञ्ज

एमआर रघुराज, कलेक्टर दतिया।

भुगतान में देरी और मनरेगा में कम मेहनताना के फेर में नहीं मिल रहे मजदूर