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खामोश रहकर दर्द को बांटिए

8 वर्ष पहले
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बताने पर गम हल्का हो जाता है। इसीलिए जब दुख आता है तो लोग आपस में मिल-बांटकर उसकी चर्चा करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि हम जानते हैं जिसे हम अपना दुख सुना रहे हैं उसके पास इसका निदान नहीं है और ना ही वह सक्षम है, लेकिन फिर भी सुनाते हैं, क्योंकि मामला है भीतर की उथल-पुथल के बाहर निकल जाने का। बाहर उसे कौन झेल रहा है यह महत्वपूर्ण नहीं होता, लेकिन इसका उल्टा होने पर हम लोग कई बार भूल कर जाते हैं। जैसे ही कोई हमें अपनी समस्या बताना शुरू करता है, तो सुनाने वाले को लगता है हम सुन रहे हैं, लेकिन हम भीतर ही भीतर उसके लिए समाधान की खोज में लग जाते हैं। मजेदार बात यह है कि सुनाने वाला चाहता भी नहीं है कि आप समाधान करें। उसे आपका संग चाहिए अपना दर्द दिखाने के लिए। उसे सिर्फ ऐसे हाथ चाहिए जो आंसू पोंछ सकें। इससे ज्यादा उसकी अपेक्षा नहीं है, लेकिन हम हर हालत में समाधान के चक्कर में जुट जाते हैं। हमारा खामोश रहकर उसका दर्द बांटना अपने आपमें उसका समाधान हो सकता है। इसलिए जब कोई अपना दुख आपको सुनाए, तो ईमानदार श्रोता बनकर सुनिए। जहां चाहत होती है वहां अशांति होती है। वह तो अशांत है ही और मदद करने की चाहत में हम भी अशांत होने लगते हैं। एक विश्राम दीजिए दोनों के बीच की वार्ता में। उसकी मांग नहीं है, तो हमारी ओर से भी क्रिया न हो। बस एक गहरी खामोशी रहे। संभवत: इसमें उसको बड़ी राहत मिल जाएगी।