बाहरी देश तय करते हैं भारत की राजनीति
भास्कर संवाददाता - मनासा
करोड़ों की आबादी वाले देश की राजनीति बाहरी देश तय करते हैं। कौन हारेगा, कौन जीतेगा, यह कहना आसान नहीं है। बाहरी देशों के इशारे पर हमारे देश की नीतियां बनाई जाती हैं।
यह बात स्वामी दिव्यानंद तीर्थ महाराज ने कही। वे बुधवार को रामद्वारा में श्रीमद् देवी भागवत कथा में देश की स्थिति पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा हर देश में विदेशी दूतावास होते हैं। दूतावास के लोग दूसरे देश में अपने देश की बात करते हैं और अपने देश के लाभ के लिए कार्य करते हैं। भारत में भी कई देशों के दूतावास हैं और वे अपने-अपने देशों के हित के विषय में सोचते हैं। भारत के दूतावास भी कई देशों में हैं लेकिन दूतावास के कर्मचारी विदेशी चकाचौंध में खो जाते हैं। अपने देश को भूलकर विदेशी धरती के विषय में सोचते हैं। रामायण में कैकेयी के साथ मंथरा दूतावास कर्मचारी की तरह आई थी। उसे अयोध्या से लेना-देना नहीं था, बस हर समय वह कैकेयी के हित के विषय में सोचती थी। कैकेयी ने कहा था कोई नृप बने हमहु का लेकिन मंथरा ने उसकी सोच बदल दी। आज विदेशी ताकते मंथरा की तरह काम कर रही हैं। अमेरिका में हमारी दूतावास कर्मचारी देवयानी को परेशान किया और भारत सरकार ने श्रेष्ठ कदम उठाया। ऐसे कदम से हमारे राष्ट्र का सम्मान कायम रहेगा। राजनीति को हमेशा देश हित और धर्महित में कार्य करना चाहिए। कथा के दौरान वर्तमान और पौराणिक उदाहरणों के माध्यम से स्वामीजी ने अपनी बात रखी।
भगवान, भक्त और दुष्ट की होती है कथा
संसार में भगवान, भक्त और दुष्ट की कथा सुनाई जाती है। भगवान की कथा सुनने से ईश्वर कृपा बरसती है और जीवन सफल हो जाता है। दुष्टों की कथा सुनने से हम सावधान होते हैं। बुरे काम नहीं करते और हर कार्य में सावधानी बरतते हैं। भक्त की कथा सुनने से मार्गदर्शन होता है और प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलना सरल हो जाता है। कथा में भगवान श्रीराम-श्रीकृष्ण का वर्णन है तो रावण-कंस का प्रसंग भी सुनाया जाता है। भक्त नरसी, प्रहलाद, मीरा की कथाएं पथ प्रदर्शक के रूप में होती हैं।
बच्चों के साथ रखें मित्र जैसा व्यवहार
स्वामीजी ने कथा में कहा माता-पिता को बच्चों को संस्कार के साथ शिक्षा देनी चाहिए। 8 साल की आयु तक बच्चे को खूब स्नेह दें। प्रेम करें। 8 से 16 साल की आयु तक कठोर अनुशासन की शिक्षा दें। 16 साल की आयु पूरी होने के बाद बच्चों से मित्रता का व्यवहार करें, फिर बच्चे कभी बिगड़ नहीं पाएंगे। मां बेटियों की मित्र बन जाएं और पिता पुत्रों के।
कथा में मौजूद महिलाएं। इनसेट-कथा सुनाते स्वामी दिव्यानंद तीर्थ महाराज।