धर्म की राह पर चले बिना मुक्ति नहीं
नीमच - भक्ति भाव के साथ धर्म की राह पर चले बिना मुक्ति नहीं होती। त्याग बिना परमार्थ नहीं हो सकता। श्रृद्धा, विवेक एवं क्रिया बिना मनुष्य जीवन का कल्याण नहीं हो सकता।
यह बात माहेश्वरी भवन में प्रवाहित अमृत प्रवचन श्रृंखला में आर्यिका गणिका विशुद्धमति माताजी ने कही।माताजी ने कहा धर्म को धारण किए बिना धर्मात्मा नहीं बन सकते। श्रावक धर्म परंपरागत मुक्ति का कारक है। साधु-संतों को भी कलिक काल में मुक्ति संभव है। अभी 21 हजार काल में से ढ़ाई हजार काल बीते हैं। अभी बहुत काल बाकी है। जब भी मंदिर में जाएं तो अपनी श्रृद्धा समर्पित न करें, उसे बनाए रखें। मन नौकर के समान है। कोई निंदा करता है तो संतोष रखें। कोई प्रशंसा करता है तो फूले न समाएं। दान और पूजा श्रावक का मुख्य कर्तव्य होना चाहिए। पूर्वजों की पूजा भी नित्य करें। माता-पिता की नित्य सेवा करें तभी जीवन महोत्सव सफल बनेगा। गुरु जिस क्षेत्र में होता है वह क्षेत्र उनका हो जाता है। एक भक्त को दर्द होता है तो गुरु उसे महसूस करते हैं। आचार्य देव कहते हैं कभी-कभी आंखों देखी भी झूठी हो सकती है। गुरु के चरणों में कामना, कष्टों, दुखों को समर्पित करें।
आज से जन्मोत्सव-आर्यिका विशुद्धमति माताजी का 65वां जन्म जयंती महोत्सव शुक्रवार से शुरू होगा। दिगंबर जैन समाज के महोत्सव में सुबह 6.30 बजे शुभप्रभात वंदना होगी। 7.30 बजे जिनाभिषेक, शांतिधारा और ध्वजारोहण होगा। दोपहर 1.30 बजे आदिनाथ जिनार्चना का कार्यक्रम होगा।
माहेश्वरी भवन में अमृत प्रवचन में विशुद्धमति माताजी ने कहा