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रामचरितमानस को जीवनचर्या का अंग बनाएं: प्रज्ञा भारती
रायसेन - तुलसी मानस समिति द्वारा आयोजित संगीतमयी श्रीरामकथा के विश्राम दिवस में साध्वी प्रज्ञा भारती ने श्रीरामचरित मानस के हनुमत चरित सुंदरकाण्ड में भक्त विभीषण के मुखारविंद से दशासन के लिए कहलवाया है कि भले ही कोई व्यक्ति गुणों का सागर क्यों न हो किंतु यदि उसमें लेशमात्र भी लोभ है तो उसे कोई भला व्यक्ति कभी नहीं कह सकता। श्रीराम के निवेदन के बाद जब समुद्र ने उनकी प्रार्थना नहीं सुनी तो श्रीराम को क्रोध आ गया और वे लक्ष्मण से कहते हैं-‘सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती, सहज कृपन सन सुंदर नीति’ अर्थात मूर्ख से निवेदन करना तथा कुटिल से प्रेम करना उचित नहीं है। कंजूस को नीति का उपदेश देना निष्प्रभावी होता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति माया में लिप्त है, उस पर ज्ञान की कथा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता तथा जो अत्यधिक लोभी है, उसे धन से विरत रहने की शिक्षा कभी पसंद नहीं आती। अत: ऐसे व्यक्ति से लोभ से विरत रहने की उम्मीद करना मूर्खता है।
साध्वी प्रज्ञा भारती आगे अपनी कथा में कहती हैं दुष्ट प्रवृत्ति के लोग उत्पात मचाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, इसलिए इनसे मुक्ति तभी संभव है, जब हम वासना से रहित हो जाएं, मनुष्य घमंड को त्यागकर प्रिय बनता है।