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फर्जी मुठभेड़ पर पारदर्शिता जरूरी

7 वर्ष पहले
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सेना का यह दावा सही हो सकता है कि पथरीबल फर्जी मुठभेड़ मामले को उसने बंद करने का फैसला इसलिए किया, क्योंकि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी सैन्य अधिकारियों के खिलाफ पहली नजर में कोई मामला नहीं बनता था। उसके इस तर्क में भी दम हो सकता है कि सबूत नहीं हैं तो वह कुछ लोगों की संतुष्टि के लिए अपने अफसरों और जवानों को सूली पर नहीं चढ़ा सकती। दरअसल, अगर बीच में सीबीआई जांच के निष्कर्ष नहीं होते तो सहज ही सेना के इस वक्तव्य को स्वीकार कर लिया जाता कि पथरीबल में 7-राष्ट्रीय राइफल्स और जम्मू-कश्मीर पुलिस की साझा कार्रवाई हुई थी, जिसे एक दिन पहले पुलिस द्वारा सेना के स्थानीय कमांडर को दी गई ठोस सूचना के आधार पर अंजाम दिया गया। गौरतलब है, जिस वक्त तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत दौरे पर थे, 20-21 मार्च 2000 की रात कश्मीर के चित्तिसिंहपुरा में आतंकवादियों ने 35 सिखों की हत्या कर दी। 25 मार्च 2000 को अनंतनाग जिले के पथरीबल गांव में कथित आतंकवादियों के खिलाफ सैनिक कार्रवाई में पांच लोग मारे गए। सेना ने दावा किया कि वे विदेशी आतंकवादी थे, लेकिन बाद में आरोप लगा कि वे उसी गांव के निर्दोष लोग थे। लाशों को कब्र से निकालकर उनकी जांच की गई। 2003 में जांच सीबीआई को सौंपी गई। 2006 में अपनी रिपोर्ट में सीबीआई ने इस घटना को फर्जी मुठभेड़ बताया और पांच सैन्यकर्मियों को इस मामले में आरोपी बनाया। मगर सेना कार्रवाई से इनकार करती रही। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2012 में सेना ने मामले का संज्ञान लिया। अब केस बंद कर दिया गया है। यही वह संदर्भ है, जिस कारण सेना से अपेक्षा रहेगी कि वह अपने निर्णय के बारे में जनमत को भरोसे में ले। वरना, कश्मीर के अलगाववादी एवं भारत विरोधी ताकतें इसे सेना की छवि धूमिल करने का आधार बनाएंगी। हाल में सेना ने माछिल फर्जी मुठभेड़ मामले में कोर्ट मार्शल का प्रशंसनीय फैसला किया था। उससे उसका यह दावा विश्वसनीय बना था कि मानवाधिकारों के हनन के प्रति वह शून्य सहनशीलता बरतती है। अब अगर वह विस्तार से बताए कि सीबीआई के निष्कर्षों को उसने किन तथ्यों एवं तर्कों के आधार पर ठुकराया तो उससे उसकी साख और बढ़ेगी।



 अभिव्यक्ति

, इंदौर

मंगलवार. २८ जनवरी, २०१४

ओल्ड इज गोल्ड

केविन रैफर्टी

प्लेनवड्र्स मीडिया के

एडिटर इन चीफ

श्चद्यड्डद्बठ्ठ2शह्म्स्रह्यद्गस्रद्बह्लशह्म्ञ्च4ड्डद्धशश.

बच्चों को सीख देने का सही तरीका यह है कि पहले उनकी चाह जान ली जाए और फिर वही करने की सलाह दी जाए।

-हैरी ट्रूमैन, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति

बात पते की

बच्चे बड़ा कमाल कर रहे हैं, मगर दो साल के किसी बच्चे को ऐसे स्केटबोर्डिंग करते हुए कभी नहीं देखा गया है। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया में रहने वाला केहलेई स्टोन कैली नाम का यह बच्चा जब छह महीने का था, तब से ही इसने स्केटबोर्डिंग करना शुरू कर दिया था। स्केटबोर्डिंग करने वाले परिवार का यह बच्चा भी अब किसी अनुभवी की तरह ही इसे करने लगा है। वह हॉप्स और कर्बस्लाइड्स जैसे स्टंट्स आसानी से कर लेता है। इस दौरान अपने पिता के निर्देशों को बड़े ध्यान से सुनता है। स्केटबोर्डिंग करते हुए इस बच्चे का वीडियो युट्यूब सहित कई वेबसाइट्स पर लगातार देखा जा रहा है।  - द्वड्डह्यद्धड्डड्ढद्यद्ग.ष्शद्व

दो साल का बच्चा करता है स्केटबोर्डिंग स्टंट्स

यह है दुनिया का सबसे महंगा सनग्लास। चश्मे बनाने वाली लग्जरी कंपनी लिंडा फैरो, बीस्पोक लग्जरी वेबसाइट के साथ इन्हें 34 हजार डॉलर ((करीब 2२ लाख रुपए)) में बेचने जा रही है। इन सनग्लासेस को जर्मनी में तैयार किया गया है। 18 कैरेट ठोस सोने के साथ इसमें सफेद, काले, गुलाबीऔर पीले हीरे जड़े गए हैं। रूबी और सफायर लगे ये सनग्लासेस दुनिया के सबसे एक्सक्लूसिव सनग्लासेस भी हैं। वेबसाइट पर कस्टमर्स इनके लैंस के रंग चुन सकते हैं। इनमें 24 कैरेट सोने, प्लेटिनम और 18 कैरेट रोज गोल्ड के ऑप्शन अवेलेबल हैं। हर खरीद के साथ कस्टमर्स को ‘मीट द ब्रांड’ एक्स्पीरियंस भी दिया जाएगा। इसमें कस्टमर लंदन के लग्जरी ब्राउन होटल में एक रात रुक सकेंगे। इसी के तहत खरीददारों को लिंडा फरो और की ऑफ अरोरा टीम को उनके माउंट स्ट्रीट स्थित बूटीक पर मिलने का मौका भी दिया जाएगा। यहां प्राइवेट वेलकम ड्रिंक के साथ लोग लिंडा फैरो के हिस्टोरिक कलेक्शन को भी देख पाएंगे।  - श्चह्म्ठ्ठद्ग2ह्य2द्बह्म्द्ग.ष्शद्व

सोने से बना, हीरे जड़ा 22 लाख रुपए का सनग्लास

दक्षिण कोरियाई कंपनी ह्युंडई हैवी मशीनरी इंजीनियरिंग के लिए भी जानी जाती है। यह कंपनी अब तक का सबसे बड़ा कंटेनर शिप बना रही है। कंपनी को चाइना शिपिंग कंटेनर लाइन्स ((सीएससीएल)) की ओर से पांच ऐसे शिप बनाने के ऑर्डर मिले थे। पहला कंटेनर शिप नवंबर तक तैयार हो जाएगा। इस शिप में 18,400 कंटेनर रखे जा सकेंगे,जो एक रिकॉर्ड होगा। वर्तमान में सबसे बड़े शिप में 18,000 कंटेनर की क्षमता है। यह शिप डेनमार्क की एपी मोएलर मस्र्क कंपनी के पास है। उसका निर्माण भी दक्षिण कोरिया की फर्म डेवू शिप बिल्डिंग कंपनी ने किया था। ह्युंडई ने कहा कि उसका नया कंटेनर शिप नई टेक्नोलॉजी से बनाया जा रहा है। भविष्य में इसे अपग्रेड कर इसकी क्षमता 19,000 कंटेनर तक की जा सकेगी। इसका डेक 400 मीटर लंबा, 30.5 मीटर ऊंचा और 58.6 मीटर चौड़ा होगा। यार्ड में तैयार होता है यह जहाज। 

 - द्दद्वड्डठ्ठद्गह्ल2शह्म्द्म.ष्शद्व

दक्षिण कोरिया में बन रहा है सबसे बड़ा कंटेनर शिप

इस फोटो को देखकर आप सोचेंगे कि या तो यह 50 के दशक के दौरान खींचा गया है या किसी विज्ञापन के लिए है। असल में यह फोटो है अमेरिका की ‘रॉकाबिली’ कयुनिटी की सदस्य का। इस कम्युनिटी के लोग आज भी 50 के दशक में अपना जीवन जी रहे हैं। इनका पहनावा, खानपान और तौरतरीके आज भी 50 के दशक की तरह है। ये अपने घरों को भी उसी दौर की तरह सजाते हैं। वैसी ही गाडिय़ों का इस्तेमाल करते हैं। जैनिफर ग्रीनबर्ग इंडियाना यूनिवर्सिटी की 36 वर्षीय प्रोफेसर पिछले दस वर्षों से इस कयुनिटी के लोगों की तस्वीरें ले रही हैं। वे कहती हैं ये लोग अपना जीवन 50 के दौर में ही जीना चाहते हैं। रॉकाबिली उस समय का पॉपुलर यूजिक था, जिसमें रॉक एंड रॉल को दूसरे संगीत के साथ मिक्स किया जाता था। पहली नजर में मुझे यह सिर्फ फैशन लगा, दरअसल ये ऐसे लोग हैं जो क्वालिटी और डिजाइन में विश्वास रखते हैं। 50 के दशक में अमेरिका में कंज्यूमर प्रोडक्ट्स इंडस्ट्रियल डिजाइनर बनाते थे जो फंक्शनिंग के साथ उसकी सुंदरता का भी ध्यान रखते थे। आज की तरह मेड इन चाइना कल्चर नहीं था। एक टोस्टर सालों चलता था और गिरकर टूटने पर सुधरवाया जा सकता था। आज कोई सामान खराब होने पर नया लेना होता है। रॉकाबिली अमेरिका के किसी एक शहर या ग्रुप तक सीमित लोग नहीं हैं। ये लोग पूरे अमेरिका में हैं। ग्रीनबर्ग ने रॉकाबिली को मानने वाले कई सैकड़ों बैंकर्स, टीचर्स, डॉक्टर्स के फोटो क्लिक किए हैं। - 2द्बह्म्द्गस्र.ष्शद्व

50 के दशक में जी रहे हैं अमेरिका की रॉकाबिली कयुनिटी के लोग

नेट की दुनिया पर उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ कंटेंट एक जगह वेब भास्कर में...

मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे ने ‘टोल फ्री महाराष्ट्र’ का बयान दिया। पूरे राज्य में रविवार से ही तोड़-फोड़ शुरू हो गई। ट्विटर पर किसी ने उन्हें अराजक कहा तो किसी ने तानाशाह।

ञ्चभाजपा और कांग्रेस के रिश्तेदार मनसे के कार्यकर्ता टोल नाकों पर ‘धार्मिक अनुष्ठान’ कर रहे हैं। अराजकता पर प्रवचन देने वालो कुछ तो शर्म करो। - आप फॉर इंडिया

ञ्चखुद को अहिंसक बताने वाली महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार ‘तानाशाह’ राज ठाकरे पर क्या कार्रवाई करेगी? -आशुतोष कुमार

ञ्च‘अराजक केजरीवाल’ की राह पर राज ठाकरे। बोल रहे आप जैसे बोल... नहीं दो टोल... ये है राजनीति के नए बोल।

-संजीव त्रिपाठी, कानपुर

दिल्ली में ‘आप’ से निष्कासित विधायक विनोद बिन्नी का राज्य सरकार के खिलाफ अनशन नाटकीय रूप से तीन घंटे में ही खत्म।

ञ्चबिन्नी का मिनी धरना...बीच में कौशाम्बी से कॉल आ गई। और हो गया दि एंड।

-जेताराम, गुजरात

ञ्चबिन्नी को तीन घंटे लगे ‘धरने का खेल’ समझने में। ज्यादा वक्त लेते तो उन्हें बाबा रामदेव जैसे उठवा दिया जाता।

-समर अनार्या, हांगकांग

ञ्चनाश्ते के बाद बिन्नी की भूख हड़ताल शुरू हुई तो दोपहर के खाने से पहले बंद। ऐसे नेता देश का उद्धार करेंगे?

-संजीय शर्मा, गाजियाबाद

ञ्च ये लीजिए...एंड दि अवॉर्ड फॉर दि फास्टेस्ट फास्ट गोज ऑन... विनोद कुमार बिन्नी।

-श्रीवत्सन वी.

नेताओं में अराजक कहलाने की होड़

2030 के बाद घरों में रोबोट काम करने लगेंगे, कई क्षेत्रों में वे मानव की जगह काम करने लगेंगे

सावधान! आ रहा है रोबोट युग

एक शब्द ने 2014 के वर्ष को आकार देना शुरू कर दिया है। इसमें चकित और मनोरंजन करने के साथ नुकसान पहुंचाने की अनगिनत संभावनाएं हैं। यह शब्द है रोबोट। यह तो रोबोट वर्ष ही साबित हो रहा है। यदि आप अकाउंटेंट, रियल इस्टेट एजेंट या खुदरा दुकान पर काम करते हैं तो सावधान हो जाइए।

गूगल ने नेस्ट लैब को खरीदकर सुर्खियां बटोरीं। स्मार्ट थर्मोस्टेट और स्मोक डिटेक्टर बनाने वाली यह कंपनी पहले से मौजूद रोबोट बनाने वाली कंपनियों की सेना में शामिल हो गई है। इनमें बोस्टन डायनामिक्स भी है, जिसे पिछले साल खरीदा गया था।

गूगल भी बिना ड्राइवर की कार बनाने में लगी है। इसका दावा है कि ड्राइवरलेस प्रायस और लेक्सस कारों के इसके बेड़े से मिले आंकड़े बताते हैं कि यह प्रशिक्षित पेशेवर ड्राइवरों से भी ज्यादा सुरक्षित कारें हैं। ड्राइवरलेस कार के समर्थक कहते हैं कि रोबोट मानव की तुलना में ज्यादा तेजी से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं और इनके सेंसर भी मानव से बेहतर होते हैं। ड्राइवर के सिर के पीछे रोबोट की तरह आंखें नहीं होतीं!

हाल में हुए लास वेगास कंज्य़ूमर इलेक्ट्रॉनिक्स शो में ऐसे ढेरों रोबोट बताए गए थे, जो आपकी खिड़कियां साफ कर सकते हैं, बच्चों को पढ़ा सकते हैं, आपका मनोरंजन कर सकते हैं या आपको कंपनी दे सकते हैं। शो का सितारा थेस्पियन नाम का एक ह्यूमोनॉइड रोबोट था। यह हाथों के इशारों के साथ अंग्रेजी में भाषण देता था। हालांकि इस रोबोट युग में अभिनेताओं को अभी तो खतरे में पड़ी प्रजाति नहीं कहा जा सकता।

इनकैप्स्यूला के मुताबिक रोबोट की तादाद में ऐसी वृद्धि हुई है कि पिछले साल 61 फीसदी वेब ट्रैफिक रोबोट द्वारा पैदा किया था जबकि मानव का योगदान सिर्फ 38.5 फीसदी ही था जबकि 2012 में उनका योगदान 49 फीसदी था। यह अच्छी खबर होने के साथ बुरी खबर भी हो सकती है।

अच्छे रोबोट में सर्च इंजन शामिल हैं, जो 31 फीसदी वेब-ट्रैफिक के लिए जिम्मेदार हैं। बुरे रोबोट्स में स्क्रेपर्स, हैकिंग टूल, स्पैमर्स और बहुरूपिये शामिल हैं। हालांकि अब स्पैमर्स और हैकर्स में कमी आई है पर अन्य बहुरूपिये तेजी से बढ़ रहे हैं। इनकैप्स्यूला चेतावनी देती है कि इन सबमें समान तथ्य यह है कि ये सारे किसी और की पहचान को अपनाने का प्रयास कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कुछ रोबोट खुद को सर्च इंजन रोबोट या अन्य वैध एजेंसियों के एजेंट के रूप में पेश करते हैं। मकसद हमेशा एक ही रहता है- वेबसाइट की सुरक्षा में सेंध लगाना। यहां बहुत से आपस में जुड़े हुए सवाल हैं, जिनमें से कुछ विचलित करने वाले हैं।

एक सवाल तो यही है कि रोबोट क्या-क्या कर सकेंगे। कुछ रोबोट विशेषज्ञों का दावा है कि 2030 तक या इसके ठीक बाद रोबोट घर का सारा काम करने लगेंगे। वाहन चलाएंगे। इंटरनेट पर दिए ऑर्डर पर घर तक सामान पहुंचाएंगे। इसलिए दुकानों पर जाने की जरूरत नहीं रहेगी और डिलीवरी वैन को ड्रोन विमानों की मदद मिलेगी। इसकी प्रारंभिक शुरुआत तो आपको आज देखने को मिल सकती है। आई-रोबोट ने रूंबा बनाया है जो वैक्यूम क्लिीनिंग कर सकता है तो स्कूबा फर्श को धो-पोंछ सकता है। कंपनी घर में काम करने लायक अन्य रोबोट पर काम कर रही है, जो वायरलैस के जरिये हेड बटलर से जुड़े होंगे, जिसे कोई मानव चला रहा होगा। जापानी वैज्ञानिक बूढ़े और बीमार लोगों की देखभाल करने में सक्षम रोबोट बनाने में लगे हैं। रोबोट की क्षमता में यकीन रखने वालों का कहना है कि आज के रोबोट कुछ साल पहले के मोबाइल फोन जैसे हैं, जो तब ईंट के आकार के और बहुत महंगे होते थे। मगर जल्दी ही हर घर में अपना रोबोट होगा। जरूरी नहीं है कि आज हम जैसा सोच रहे हैं, वे वैसे ही नजर आएं या वे हमारे जैसे होंगे, क्योंकि रोबोट में हमारे जैसे अकुशल फीचर्स क्यों होने चाहिए, जिसमें कमजोर शरीर भी शामिल हैं?

एक अन्य चिंता इस क्षेत्र में किसी एक कंपनी या बड़े कॉरपोरेशन का प्रभुत्व होने की है। गूगल ने हाल ही नेस्ट और बोस्टन डायनामिक्स को खरीदा है। उससे पहले पिछले कुछ माह में वह सात नई कंपनियों को खरीद चुकी है। इन सारी कंपनियों के पास हाथों, भुजाओं और गतिविधियों से जुड़े अच्छे सिस्टम हैं। बेहतर विकान प्रोसेसर हैं। गूगल ने जब बोस्टर डायनामिक्स को खरीदा तो सुर्खी बनी थी, ‘रोबोट्स आ रहे हैं और मालिक है गूगल।’ बेशक गूगल को भी स्पद्र्धा का सामना करना पड़ेगा, जिसकी अपनी भयावह संभावनाएं हैं। जब अमेजन ने ड्रोन के जरिये डिलीवरी करने की योजना जाहिर की तो ब्लॉग्स पर लतीफों की बाढ़ आ गई। यह भी कहा गया कि अमेजन का वॉलमार्ट के साथ ड्रोन युद्ध शुरू होगा। वह अमेजन के ड्रोन की डिलीवरी में देर करने के लिए अपने ड्रोन भेजेगी। यह भी कहा गया कि बहुत सारे ड्रोन के कारण आसमान काला हो जाएगा। उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा तो छोड़ो, आधुनिक टेक्नोलॉजी के मुताबिक कानून ढालने में सरकारों की विफलता भी चिंता का कारण है।

अंत में दुनिया के कामगारों के लिए सबसे विचलित करने वाला सवाल, क्या रोबोट काम की जगहों पर मानव की जगह ले लेंगे? परंपरागत जवाब तो यही है कि नई टेक्नोलॉजी काम का तनाव दूर कर देगी और मानव ज्यादा कुशलता से काम कर सकेगा। 19वीं सदी में टैक्सटाइल मशीनों को तोडऩे वाले ल्यूडाइट नामक ब्रिटिश बुनकरों को याद कीजिए, वे गलत साबित हुए और मशीनों के कारण वाकई नई नौकरियां आईं, संपन्नता बढ़ी। किंतु रोबोट इतनी तेजी से और इतने सारे क्षेत्रों में आ रहे हैं कि कामगारों के लिए चिंता की बात तो है।

अमेरिका के पूर्व वित्त मंत्री लारेंस समर्स ने 25 से 54 वर्ष आयु के अमेरिकियों में रोजगार पर गौर किया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि 1960 के दशक में 20 लोगों में केवल एक व्यक्ति बेरोजगार होता था, लेकिन अब सोच-विचारकर किया जा रहा तकनीकी बदलाव वर्कर का विकल्प खोजने का रूप ले रहा है। इसका नतीजा यह हो सकता है कि अब से दस साल बाद हर सात व्यक्तियों में से एक बेरोजगार हो। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मार्टिन स्कूल के कार्ल फ्रे और माइकल ओसबोर्न का आकलन है कि टेली मार्केटिंग में लगे लोगों को सबसे ज्यादा खतरा है। लगभग पूरी संभावना है कि बड़ी डाटा और स्मार्ट मशीनें विकसित होने के साथ वे उनका स्थान ले लेंगी। यदि 1 का अंक रोजगार जाने की निश्चितता बताता हो तो अकाउंटेंट और ऑडिटर ((0.94)), रियल सेल्स स्टाफ ((0.92)), रियल इस्टेट एजेंट ((0.86)) को खबरदार हो जाना चाहिए जबकि पायलट ((0.55)) और अर्थशास्त्री ((0.43)) के लिए चिंता का कारण है। फिलहाल तो केवल रिक्रिएशनल थेरेपिस्ट ((0.003)), डेंटिस्ट ((0.004)) और धर्म गुरु, पंडे, पुरोहित, पादरी ही सुपरसेफ कहे जा सकते हैं।

जीवन दर्शन

छोटे भाई ने बड़े भाई को दी सच्चाई की सीख

गोपाल कृष्ण गोखले बहुत बड़े देशभक्त और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके बाल्यकाल की एक घटना है जो सिद्धांतों के प्रति उनके निष्ठावान होने का प्रमाण है और आज भी युवा पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक है। गोपाल एक दिन अपने बड़े भाई गोविंद के साथ कबड्डी खेल रहे थे। गोविंद विरोधी टीम में थे। जब खेलते हुए गोविंद के आगे आने की बारी आई तो उन्होंने गोपाल को इशारा किया कि वे उन्हें न पकड़ें और अपनी टीम के लिए अंक जुटाने दें। अपने बड़े भाई के संकेत को गोपाल ने समझकर भी नहीं माना और अपनी टीम की ओर से पूरी शक्ति के साथ गोविंद को पकडऩे में जुट गए। संघर्ष लंबा चला, किंतु अंतत: गोविंद पकड़े गए। हालांकि बात खेल की ही थी, लेकिन इस बात का गोविंद को बहुत बुरा लगा। उन्होंने सोचा कि उम्र में छोटा होकर भी गोपाल ने उनका आग्रह नहीं माना। यह ठीक बात नहीं है। घर लौटते समय उन्होंने खेल की इस घटना का जिक्र करते हुए अपने भाई के व्यवहार पर आपत्ति ली और कहा, क्रगोपाल! जब मैंने तुझे मना किया था कि मुझे नहीं पकडऩा तो तूने मुझे क्यों पकड़ा? तू मेरा भाई है या दुश्मन, जो बड़े भाई की इतनी-सी बात भी नहीं मान सका? अगर मान लेता तो मुझे टीम में मान मिलता।ञ्ज बड़े भाई की बात सुनकर गोपाल ने कहा, क्रभैया? आपके प्रति मेरे मन में पूरी श्रद्धा है। आप जो भी कहेंगे, मैं मानूंगा, किंतु खेल में जब आप विरोधी टीम में हैं तो मैं आपका साथ नहीं दे सकता। ऐसा करने की अपेक्षा तो मैं खेल से हट जाना पसंद करूंगा।ञ्ज स्वयं से पांच वर्ष छोटे गोपाल की ईमानदारी ने बड़े भाई को अपने आचरण पर लज्जित कर दिया। वस्तुत: ईमानदारी ऐसी नैतिकता है, जो आत्मशुचिता बनाए रखते हुए समाज को संस्कार संपन्न बनाती है।

जीने की राह

अहंकार छोड़कर जाएं गुरु के सामने

अच्छे लोगों की हम निकटता चाहते हैं और जो हमें पसंद नहीं है उनसे हम भागना चाहते हैं। इन दोनों में हमारा अहंकार बाधा बनता है। अहंकार हमें उन लोगों से दूर ले जाता है जिनकी निकटता में हम स्वयं को जान सकते हैं, लेकिन हमारा मन इसमें बाधा बनता है। मन का क्रियात्मक रूप ही अहंकार है। सुंदरकांड में समुद्र और श्रीराम के बीच यही हुआ। जब श्रीराम आवेश में आए तब समुद्र मार्ग देने को तैयार हुआ और मणियों का थाल भरकर भगवान के सामने पहुंचा। ‘मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।। कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।’ मगर सांप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया। इस प्रसंग पर तुलसीदासजी ने दो इशारे किए हैं। श्रीराम के क्रोध के आगे जलचर जलने लगे थे। समुद्र को लगा इसका कारण मैं हूं। चूंकि उसे राम का सानिध्य मिल रहा था इसलिए उसके अहंकार ने गलना शुरू किया और वह समझ गया कि यदि मैंने अभिमान नहीं छोड़ा तो मुझे श्रीराम की निकटता नहीं मिलेगी। फिर वह अभिमान छोड़कर उपस्थित हुआ। परमात्मा के सामने, गुरु के सामने और अपने माता-पिता के सामने हमें अभिमान शून्य होकर जाना चाहिए, क्योंकि अहंकार हटने के बाद हम इन तीनों के समक्ष अपना समर्पण भाव ला सकेंगे। वरना हमारा अहंकार इनसे दूर भागता है। इनका सान्निध्य नसीब वालों को ही मिलता है।

-पं. विजयशंकर मेहता - द्धह्वद्वड्डह्म्द्गद्धड्डठ्ठह्वद्वड्डठ्ठञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व

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केजरीवाल और उनके कानून मंत्री की अराजकता की तो चर्चा हुई, लेकिन पुलिस को जवाबदेह बनाने का मूल मुद्दा खो गया। सुप्रीम कोर्ट के कहने पर भी पुलिस सुधार लागू नहीं हुए हैं।

ञ्चसुरेंद्र किशोर

‘आप’ बनाम अन्य के बीच आरोप-प्रत्यारोपों के शोर में पुलिस को जवाबदेह बनाने का असली मुद्दा कहीं गुम हो गया। जबकि, इस मुद्दे को उठाने का यह अच्छा अवसर था। दरअसल हमारी मुख्य धारा की राजनीति को मुख्य मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाने की कला खूब आती है।

अब इस पर कोई चर्चा नहीं है कि पुलिस के बेलगाम हिस्से के हाथों आम लोगों के लगातार पीडि़त होते रहने की समस्या से यह देश कैसे व कब निजात पाएगा। अरविंद केजरीवाल और उनके विधि मंत्री के अराजक व्यवहार की चर्चा जरूर हो रही है। होनी भी चाहिए। यह सही है कि यदि उन्होंने कोई अन्य शालीन तरीके अपनाए होते तो बेहतर होता।

पर सवाल यह भी है कि यदि मुख्यमंत्री ने धरना नहीं दिया होता तो क्या उन दो पुलिस अफसरों को छुट्टी पर भेजा जाता? यानी दो मामूली पुलिस अफसरों को सिर्फ छुट्टी पर भेजने के लिए भी मुख्यमंत्री को धरना देना पड़ता है। सत्ताधारियों द्वारा आखिर कितनी ताकतवर और निरंकुश बना दी गई है हमारी पुलिस?

आश्चर्य नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद किसी राज्य ने पुलिस सुधार लागू नहीं किए। देश की सबसे बड़ी अदालत ने 2006 में ही पुलिस को स्वायत्तता देने के लिए सात सूत्री उपाय करने का निर्देश केंद्र व राज्यों को दिया था। दरअसल अपवादों को छोड़ दें तो विभिन्न सरकारें आमतौर पर पुलिस का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए करती हैं।

‘आप’ के दिल्ली धरने के समय भी यह सवाल उठा था कि क्यों किसी केंद्रीय मंत्री के आवास पर मात्र पत्थर फेंके जाने के बाद तो पुलिस अफसर को सजा दे दी जाती है पर दिल्ली सरकार के मंत्रियों के कहने पर भी संदिग्धों व अपराधियों के छिपे स्थानों पर पुलिस छापे तक नहीं मारती? पुलिस ऐसी लापरवाही इस बात के बावजूद कर रही है कि दिल्ली में अपराध का ग्राफ इन दिनों तेजी से बढ़ता जा रहा है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2012 में दिल्ली में अपराध की कुल 51 हजार 479 घटनाएं हुई थीं जबकि 2013 में यह संख्या बढ़कर 73,958 हो गई। इसी अवधि में दुराचार की घटनाओं की संख्या 680 से बढ़कर 1559 हो गई। लगभग पूरे देश में अपराध व पुलिस की कार्यशैली का कमोबेश यही हाल है। पर दिल्ली पुलिस बनाम केजरीवाल विवाद को लेकर प्रभुत्व वर्ग के एक बड़े हिस्से के साथ बड़े-बड़े रिटायर्ड व मौजूदा पुलिस अफसरों ने जिस तरह ट्रेड यूनियन मानसिकता के साथ केजरीवाल की आलोचना की है, उससे देश की खासतौर पर पुलिस प्रशासन की चिंताजनक स्थिति ही सामने आती है।

केजरीवाल मुख्यमंत्री बनने के बाद आलीशान दफ्तर में बैठकर शांतिपूर्वक राजपाट चला सकते थे। वे कह सकते थे कि अपराध होता है तो होने दो, मैं क्या करूं, दिल्ली पुलिस पर हमारा कोई कंट्रोल तो है नहीं। पर अपने ‘अराजक’ तरीके से ही सही, केजरीवाल ने बेलगाम व गैर जिम्मेदार पुलिस व्यवस्था व उनके संरक्षकों की असली तस्वीर देश के सामने रख दी है।

लेखक दैनिक भास्कर, पटना के एडिटोरियल एडवाइजर हैं। ह्यह्वह्म्द्गठ्ठस्रड्डह्म्द्मद्बह्यद्धशह्म्द्गञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व

अराजकता के शोर में

मूल मुद्दा गायब