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जिला अस्पताल में भर्ती होने वाली 10 प्रतिशत गर्भवतियों में खून की कमी
सरकारी स्तर पर किए जा रहे प्रयास से भी महिलाओं की खून की कमी नहीं हो पा रही दूर
भास्कर संवाददाता - झाबुआ
अस्पताल में हर महीने औसतन 300 गर्भवतियों भर्ती होती हैं। इसमें से 10 से 15 फीसदी केस में खून की कमी की शिकायतें मिल रही हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रसूति वार्ड में पांच महीने के भीतर ही सीवियर एनीमिया के 195 मामले सामने आए। इन सभी में हीमोग्लोबिन का स्तर पांच ग्राम से भी कम पाया गया। खून की कमी से मां की जान को तो खतरा रहता ही है, वहीं जन्म लेने वाले शिशु का विकास भी सही ढंग से नहीं हो पाता। ऐसे में कई बार चिकित्सक स्थानीयस्तर पर प्रसूति कराने की रिस्क लेने के बजाए गर्भवती को बाहर रैफर कर देते हैं।
इसलिए होता है एनीमिया
डॉ. स्मिता त्रिवेदी के अनुसार महिलाओं में एनीमिया की बड़ी वजह रक्तस्त्राव, रक्त के निर्माण में कमी और लाल रक्त कोशिकाओं का विनाश होना है। अमूमन महिलाओं को आयरन डिफिशिएंसी एनीमिया होता है। इस वजह से कई तरह की दिक्कतें पैदा हो जाती है। इससे बचने का बेहतर उपाय है कि महिलाएं फॉलिक एसिड की टेबलेट का सेवन करें। कभी-कभी किसी दूसरी बीमारी की वजह से भी एनीमिया होता है, पहले उसका उपचार लें। इसके अलावा पौष्टिक आहार लें। भोजन में गाजर व चुकंदर के सेवन से भी समस्या दूर हो सकती है।
एक नजर
> ग्राम छापरी की गीता पति हरमल निवासी छापरी को जब भर्ती किया गया तो उसका हीमोग्लोबिन महज 4.8 ग्राम था। डिलेवरी के बाद उसे खून चढ़ाना पड़ा।
> ग्राम डिग्गी की हेतू भावसिंग को प्रसूति वार्ड में भर्ती कराया गया तो डॉक्टर भी चौंक गए। हीमोग्लोबिन का स्तर 4 ग्राम ही था।
एनीमिया के लक्षण
शरीर में पीलापन, थोड़े से परिश्रम से सांस फूलना, हृदय का स्पंदन बढऩा, भोजन में कमी, भूख में कमी, घबराहट, आंखों के सामने अंधेरा छा जाना।
एनीमिया के ये भी हैं कारण
> महिलाओं में शिक्षा की कमी।
> ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की कम उम्र में शादी करना।
> गर्भवतियों को पर्याप्त पोषण आहार नहीं मिलना। भोजन में प्रोटीन और लोह तत्वों की कमी।
> स्वास्थ्य को लेकर महिलाओं का गंभीर नहीं होना।
सरकारी स्तर पर ये हो
रही है कवायद
> प्रत्येक आंगनवाड़ी केंद्र पर आयरन व फोलिक एसिड की गोलियां उपलब्ध रहती है। इन्हें गर्भवतियों को खिलाया जाता है। हालांकि जिस तरह की स्थिति है, उससे तो यही साबित होता है कि सारा कामकाज कागजों पर ही चल रहा है।
> गांव में तैनात प्रत्येक आशा कार्यकर्ता को गर्भवती महिला ट्रेकिंग प्रपत्र तैयार करना है, जिससे उनमें एनीमिया हो तो पता लग सके, लेकिन मैदानी अमले द्वारा ऐसा कुछ नहीं किया जा रहा।
प्रसूति वार्ड में भर्ती होने वाली कई महिलाओं को एनिमिया की शिकायत होती है।