पाप नाश के लिए भगवान लेते अवतार
सिटी रिपोर्टर - रतलाम
परमात्मा के अवतार के गम्य-अगम्य अनेक कारण हैं। पाप का नाश और प्रभु लीलाओं के लिए भगवान का अवतार होता है। अहंकारी का नाश प्रभु की लीलाओं से ही होता है। ये विचार इंद्रलोकनगर स्थित पंचमुखी हनुमान व इंद्रेश्वर महादेव परिसर में आयोजित रामकथा में पं. योगेश्वर शास्त्री ने व्यक्त किए।
उन्होंने बताया अंत:करण के चार भेद होते हैं। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। अंत:करण संकल्प विकल्प करें तब मन कहलाता है। निर्णय करें तब बुद्धि, भगवान का चिंतन करें तब चित्त कहलाता है। जब अभिमान जागता है तो यह अहंकार बन जाता है। परमात्मा के दर्शन करने से मन शुद्ध होता है। जहां सतगुण होता है वहीं प्रभु का वास होता है। उन्होंने रामावतार के अनेक प्रसंगों का वर्णन किया। किशन दरयानी, मोहनसिंह जाट, लल्लनसिंह ने व्यासपीठ का पूजन किया।