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‘मृत्यु से भयभीत न हों, मोह की कालिमा से बचें’

8 वर्ष पहले
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प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर में ऐलकश्री ने प्रवचन दिए
निज संवाददाता -!-खुरई
प्राचीन दिगंबर जैन मंदिर में ऐलक श्री निशंक सागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि मृत्यु से भयभीत न हों, मोह की कालिमा से बचें। मोह से ही सभी प्राणी एक गति से दूसरी गति पाते हैं और उस गति में जो नया शरीर मिलता है उसमें इन्द्रियों की खिड़की मिलती है, जो पुन: अपने-अपने इच्छित विषयों को ग्रहण करती है। वही अच्छा-बुरा सोच, शुभ-अशुभ कर्मों को बुलाकर अपनी आत्मा से बांध देता है। यही कर्म पुन: संसार भ्रमण के कारण होते हैं।
कर्म की सत्ता को सभी धर्मों ने स्वीकारा है तथा संसार के सुख-दुख भी कर्म के अनुसार ही मिलते हैं। जब हमारे किए का ही फल हमें भोगना है, तो हम अपने विवेक का उपयोग अवश्य करें। उन्होंने कहा कि पाप कर्म को न बांधें, पाप के कारणों को अपने पास न आने दें, न हम पाप की काली छाया में जाएं।
मृत्यु न तो सुख-दुख देती है, न गति और संसार के भोगोपभोग का साधन है। यह तो हमारे विचार-चिन्तन पर निर्भर है। यदि दुख के साधन बीमारी, दरिद्रता, अभाव, कष्ट, परेशानी और अपमान-अपवाद भी मिलें, पर हम अच्छी संगति, संस्कार एवं धर्म मार्ग से दूर न हों तो यह सब भी हमें दुख दे नहीं सकते। उल्टे हमें कष्टों को सहने की शक्ति देंगे। कर्म तो हमें पूर्व में किए अपराधों का परिचय कराके समता-शांति से जीने का मार्ग बताते हैं।