‘जीवन निर्माण की शिक्षा बहुत दुर्लभ’
बीना। ग्राम खिमलासा में मंदिर निर्माण एवं जीर्णोद्धार के अवसर पर आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए ऐलक विवेकानंद सागर ने कहा कि जीवन निर्वाह की शिक्षा बहुत सुलभ होती है परंतु जीवन निर्माण की शिक्षा बहुत दुर्लभ है। आज हमने जिनालय का शिलान्यास कर जीवन के निर्वाह की शिक्षा प्राप्त की है। मुनि अजित सागर के समक्ष विवेकानंद जी ने कहा कि विषय भोगों की सामग्री का संग्रह पाप का कारण बन जाता है और जो व्यक्ति आत्मकल्याण की सामग्री का संग्रह करता है वह अपना मोक्ष मार्ग प्रशस्त कर लेता है। संपूर्ण जीव लोक में मात्र मनुष्य पर्याय ही ऐसी है जो मंदिर निर्माण के कार्यों को एवं पंचकल्याणक कराने की पात्रता रखता है। आत्म अनुभूति का श्रेष्ठ साधन जिनालय हुआ करते हैं, जिसमें भगवान जिनेंद्रदेव की पूज्य प्रतिमाएं विराजमान होती हैं। ऐलकश्री ने कहा कि वर्तमान समय में व्यक्ति वृक्ष के फल को तोडऩा तो नहीं चाहता वरन पूरा वृक्ष काटने को ही अमादा है। जिस तरह संसारी जीव परिस्थितिजन्य वास्तुशास्त्र के हिसाब से अपने नवीन घर का निर्माण करता है एवं पुराने निवास को सुधरवाता है उसी तरह हमें मंदिर की देखरेख भी करना चाहिए।
उन्होंने बताया कि समस्त झगड़ों का मूल आधार जर, जोरू और जमीन होते हैं। इससे आप जितना मोह करेंगे उतना ही अनिष्ट होगा। इसके विपरीत इसका जितना भी त्याग करेंगे, उतना ही फलदायी होगा। अधिक धन संचय से हमारे परिवार के बंटवारे में वैमनस्यता, लड़ाई, झगड़े बढऩे की प्रबल संभावनाएं उदित हो जाती हैं। स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण, धन, संपत्ति, झगड़े के निमित्त बन जाते हैं। व्यक्ति जितना उदार होता है करुणाभाव से परिपूर्ण होता है उतने ही अल्प समय में वह अपनी मंजिल प्राप्त कर लेता है।
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