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डॉ. गुप्त बने दूसरे संस्कृत कमीशन के सदस्य

7 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता.उज्जैन
शहर के संस्कृतविद् डॉ. मोहन गुप्त को भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से हाल ही में गठित किए गए द्वितीय राष्ट्रीय संस्कृत कमीशन का सदस्य बनाया गया है। कुलपति सहित देशभर के 13 संस्कृत विद्वान इस कमीशन के सदस्य बनाए गए हैं, जिनमें प्रदेश से एकमात्र नाम डॉ. गुप्त का है।
डॉ. गुप्त महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विवि के कुलपति, उज्जैन के संभागायुक्त व शासन के प्रमुख सचिव के पद पर रह चुके हैं। डॉ. गुप्त के पुत्र पंकज मित्तल ने बताया देश में संस्कृत शिक्षा की वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन कर आधुनिक शिक्षा पद्धति में पारंपरिक संस्कृत ज्ञान का समावेश किए जाने के लिए द्वितीय संस्कृत कमीशन का गठन मंत्रालय की ओर से किया गया है। कमीशन का चेयरमैन संस्कृत विद्वान एवं ज्ञानपीठ व पद्मभूषण पुरस्कार प्राप्त डॉ. सत्यव्रत शास्त्री को बनाया गया है। डॉ. गुप्त के सदस्य बनाए जाने पर शहर सहित अन्य संस्कृत विद्वानों ने उन्हें बधाई दी है।
1956 में पहली बार हुआ था गठन - संस्कृत कमीशन का गठन देश में दूसरी बार हुआ है। इसके पहले पं. जवाहरलाल नेहरु के शासनकाल में 1956 में संस्कृत कमीशन का गठन किया था लेकिन राजनीतिक खींचतान के कारण कमीशन को समाप्त कर दिया गया था।
यह बने सदस्य: द्वितीय संस्कृत कमीशन में चेयरमैन प्रो. शास्त्री व सदस्य डॉ. गुप्त के अलावा गौतम पटेल ((गुजरात)), प्रो. सुदर्शन शर्मा ((तिरुपति)), देवर्षि कलानाथ शास्त्री ((जयपुर)), प्रो. मानवेंदु बैनर्जी ((कोलकाता)), प्रो. के. रामासुब्रमण्यम् ((मुंबई)), डॉ. पी. रामानुजन ((बैंगलुरु)), प्रो. आरके दुबे ((कानपुर)), प्रो. वैम्पटि कुटुंब शास्त्री ((सोमनाथ)), प्रो. स्वपना देवी ((असम)), डॉ. योगानंद शास्त्री ((दिल्ली)) एवं कुलपति राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान नईदिल्ली पदेन सचिव को सदस्य बनाया है।



डॉ. गुप्त के संस्कृत में योगदान पर एक नजर

संस्कृत में डी.लिट डॉ. गुप्त ने महाभारत के काल निर्णय विषय पर अपने शोध में महाभारत युद्ध की तिथि निर्धारित की है। इसके अलावा डॉ. गुप्त ने वेदों, पुराणों, उपनिषदों पर भी शोध किया। वैदिक गणित पर इनका शोध प्रबंध अंतरराष्ट्रीय एनसाइक्लोपीडिया क्रोनोलॉजी ऑफ वेदास में प्रकाशित हुआ है। दो दर्जन से अधिक संस्कृत पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। कुछ दिनों पहले संस्कृत में निपुणता एवं शास्त्र में पाण्डित्य के लिए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया है।