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खिलाडिय़ों को अच्छी खेल सुविधाएं देने की जरूरत : डॉ. सैनी
जीएनडीयू में चल रही ग्लोबल साइंटिफिक कांफ्रेंस का दूसरा दिन
भास्कर न्यूज - अमृतसर
गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में चल रहे फिजिकल एजुकेशन हेल्थ एंड स्पोट्र्स साइंसेज में ग्लोबल साइंटिफिक कांफ्रेंस के दूसरे दिन चार टेक्निकल सेशन का आयोजन किया गया, जिसकी प्रधानगी पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के फिजिकल एजुकेशन विभाग के प्रोफेसर एनएस मान ने की। इस दौरान 10 शोधपत्र पढ़े गए। इस बीच गुरु नानक ऑडिटोरियम में पोस्टर मेकिंग मुकाबले भी करवाए गए।इस दौरान खेल के दौरान लगने वाली चोटों विषय पर सेशन भी करवाया गया।
वहीं, भारतीय खेल और व्यापारीकरण विषय पर पैनल डिस्कशन का भी आयोजन किया गया, जिसमें कई माहिर खिलाड़ी, साइक्लॉजिस्ट और समीक्षक शामिल हुए।इसमें वक्ताओं का कहना था कि अगर हम अपने देश में खेलों को प्रफुल्लित करना चाहते हैं तो सबसे पहले स्कूल स्तर से ही अच्छी सुविधाएं खिलाडिय़ों को देनी होंगी। इसके बाद खिलाडिय़ों को इतनी फाइनेंशियल एड देने की आवश्यकता है जिससे वह अपने परिवार का निर्वाह कर सकें और सम्मान के साथ जीवन व्यतीत कर सकें।साइक्लॉजिस्ट डॉ. अविनाश संधू ने कहा कि खेल की भावना खिलाडिय़ों में पहले से ही होनी चाहिए। प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय लॉन टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर पैसों के पीछे भागे बिना खेलों को प्रफुल्लित कर रहे हैं। प्रिंसिपल स्वर्ण सिंह ने बताया कि कबड्डी विश्व कप में 20 करोड़ रुपए खर्च किए गए। जिसके बाद पता चला कि मशहूर अटैक जाफी प्रति माह 3.50 लाख रुपए महीना नशे पर खर्च कर रहा है। ऐसे में हम अपने युवाओं को क्या जानकारी दे रहे हैं। अर्जुन अवार्डी डॉ. रूपा सैनी ने बताया कि खिलाडिय़ों को अच्छी खेल सुविधाएं देने की आवश्यकता है। इस अवसर पर प्रो. कंवलजीत सिंह, प्रो. गुंजन भारद्वाज, डॉ. दलविंदर सिंह, डॉ. सुरजीत सिंह, प्रो. मोनिका आदि मौजूद थे।
बांग्लादेश में सरकार ने तीन साल पहले ही खेलों के बारे में सोचना शुरू किया : रहमान
बांग्लादेश में सरकार ने तीन साल पहले ही खेलों के बारे में सोचना शुरू किया है। वर्ष 2011 से लेकर अभी तक तीन यूनिवर्सिटीज इस्लामिक यूनिवर्सिटी, ज़ासोर साइंस एंड टेक्नालॉजी और रोज़शाई यूनिवर्सिटी में ही फिजिकल एजुकेशन और रिसर्च चल रही है। यह जानकारी इस्लामिक यूनिवर्सिटी बांग्लादेश से कांफ्रेंस में भाग लेने भारत पहुंचे मोहम्मद अशादूर रहमान ने बातचीत में दी। रहमान ने कहा कि वहां अभिभावक भी खेलों की ओर ध्यान नहीं देते। यही कारण है कि वहां काफी पढ़े- लिखे बच्चे तो मिल जाएंगे लेकिन शारीरिक रूप से वे काफी कमजोर होते हैं। अब लोगों की धारणा बदलने का प्रयास चल रहा है, लेकिन जो लोग भी धारणा बदल रहे हैं वह मात्र क्रिकेट तक ही सीमित हो जाते हैं। बांग्लादेश में भी क्रिकेट का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। दूसरा अगर कोई खेल किसी को सूझता है तो वह फुटबॉल है। इन दोनों खेलों के अलावा बच्चे और अभिभावक किसी अन्य खेल के बारे में नहीं सोचते।
आयोजन - कांफ्रेंस के दूसरे दिन चार टेक्निकल सेशन हुए, जिसकी अध्यक्षता पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एनएस मान ने की।