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सिस्टम से लडऩे का सिस्टमेटिक तरीका फिर भी तारों से मुश्किलें हैं बरकरार
कौशल सिंह - लुधियाना
इन्होंने सिस्टम से लडऩे के लिए एक स्टिमेटिक तरीका अपनाया। पहले पार्क की स्ट्रीट लाइटें सुबह देर तक जली रहती थीं; स्विच ऑन-ऑफ करने के लिए रखे गए मुलाजिम को सुबह-शाम फोन करना पड़ता था। बाद में अधिकारियों को शिकायत की तो जवाब मिला; हमारे मुलाजिम तो समय पर ही आकर ही स्विच ऑफ कर जाते हैं, इन्होंने इसका भी तोड़ निकाला और पार्क के पेड़ पर एक घड़ी टांगी और जलती स्ट्रीट लाइटों के साथ उसकी फोटो ली ताकि, समय और लाइटों के जले होने की सही टाइमिंग का पता चले सके। यह किस्सा है; प्रताप कॉलोनी के रहने वाले एसबी पांधी का। उन्होंने पावरकॉम से मोहल्भ्ले और पार्क में बिजली की बदहाली की शिकायतें लिखित रूप से कीं, लेकिन कुछ ठोस नतीजा नहीं निकला। फिर शुरू की इन्हों हुई बिजली महकमे से टालमटोल, लापरवाही और झूलती तारों के खिलाफ एक मुहिम।
करंट से मरते-मरते बची
पड़ोस की रहने वाली एक महिला करंट की चपेट में आकर मरते-मरते बची; पावरकॉम के मुलाजिमों से शिकायत भी की फिर भी झूलते तारों से निजात नहीं मिला। उलटा मुलाजिम कभी अपने अधिकारियों के पास जाने की बात करते तो कभी बहानेबाजी करते रहे।
हद तो तब हुई जबकि पावकॉम ने तारों और खंभे को दूसरी जगह शिफ्ट करने की एवज में भारीभरकम रकम की मांग की। मामला सीनियर एक्सईएन कुलबीर सिंह तक पहुंचा लेकिन वे भी लगातार बहाने बनाते रहे और अब तक करंट की चपेट में आने से बचाव का कोई रास्ता
नहीं निकला।