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केवल आयोजनों तक ही सिमट कर रह गए हैं बैसाखी जैसे त्यौहार

8 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज - बरनाला
चल चलिए बैसाखी दे मेले, मुंडा तेरा मैं चुक लूं , जैसे गीत चाहे आज सुनने को नहीं मिलते। लेकिन, इन गीतों के जरिए आज भी अपने पुरातन पंजाब की झलक दिखाई देती है।
इसमें बैसाखी के मौके पर गांव में लगने वाले मेलों में जाने की तैयारियों में जुटे गबरू और मुटियारों की नटखट अठखेलियां इन गीतों में खुद-ब-खुद बयां हो जाती है।
आज त्योहारों के बारे में क्या कहते है लोग : किंग्ज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूट बरनाला के चेयरमैन हरदेव सिंह बाजवा का कहना है कि अब युवाओं के सामने अधकचरी संस्कृति परोसी जा रही है। अब न तो वह मेले लगते है ओर न ही समय है कि वे मिलकर त्योहार मना सके। जिला प्रोपर्टी एसोसिएशन के प्रधान अनिल भारती सोनी का कहना है कि आधुनिकता की दौड़ में त्योहार असली स्वरूप खो चुके है। अब न तो बैसाखी की सुबह दरिया, नदियों पर मेले जैसा माहौल दिखाई देता है न ही कटाई से पहले खेतों में ढोल के साथ खुशी मनाते गबरू, मुटियारों के
झुंड दिखाई देते है। समाजसेवी जतिंदर गोयल कहते है कि अब त्योहार के नाम पर होटलों, क्लबों के परिसर में बड़े-बड़े आयोजन होने लगे हैं। अब तो किसान भी फसल की कटाई के लिए बैसाखी का इंतजार नहीं करता, पहले ही कटाई शुरू हो जाती है। समाजसेवी दीपक मित्तल का कहना है कि त्योहार का असली महत्व व इतिहास के बारे में कोई नहीं जानता।