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- ‘गायकी च लचरता दी वजा किते न किते मीडिया वी है’
‘गायकी च लचरता दी वजा किते न किते मीडिया वी है’
भास्कर न्यूज - पटियाला
संगीत दा स्वाद उदों सी जदों भारत चं सुरिंदर कौर ते पाकिस्तान च रेशमा गाउंदी सीं। फेर हुण ‘मीडिया साब’ आ गए ते इन्हां दे औण नाल गायकी दा मिजाज ही बदल गया। गीत संगीत दी पाकिजगी किते गवाच गई। गाने आ गए ‘जे तेरे नाल व्याह न होएया तां गुरु ग्रंथ साब लैके भज्ज जूं।’
इसदे लई लोकां नूं अग्गे आउणा पैणां ते अजेही गायकी नूं सिरे तों नकार देणा चाहिदा।’ ये विचार पद्मश्री राजगायक हंसराज हंस ने 30वीं अंतरराष्ट्रीय पंजाबी विकास कांफ्रेंस के समापन समारोह के दौरान पंजाबी यूनिवर्सिटी में दिए। ‘पंजाबी समाज और मीडिया’ विषय पर कराई कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि पद्मश्री हंसराज हंस ने कहा कि गायकी में आ चुकी लचरता से कामयाबी कुछ समय की होती है। लेकिन इस लचरता और संगीत के पतन की वजह कहीं न कहीं मीडिया है। आज हर चीज के लिए मार्केटिंग हो चुकी है और यही हाल संगीत का है। संगीत भी पूरी तरह से व्यवसायिक हो गया है। लोग पैसा कमाने के लिए संगीत बना रहे हैं।
उन्होंने कहा कि मीडिया सबको सम्मोहन में बांध लेता है। अगर हम किसी भी बात को बार बार दोहराएंगे तो वो सच मानी जाएगी। मीडिया में बार बार आने वाले इश्तिहार विचार आम आदमी की मानसिकता को प्रभावित कर ही लेते हैं। इसलिए मीडिया को सदैव सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
इससे पहले वीसी डॉ. जसपाल सिंह ने कहा कि कांफ्रेंस में सामाजिक सरोकारों से मीडिया के संबंधों पर चर्चा हुई है। इससे एक बेहतर समाज का निर्माण हो सकेगा। मीडिया को देश के सामाजिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक हितों को बचाने के लिए जागरूक रहने की जरूरत है।
पंजाबी साहित्य अकादमी के सचिव डॉ. रवेल सिंह ने कहा कि मीडिया द्वारा हम अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं। ताकि लोक राज बेहतर तरीके से चल सके। लेकिन दुख इस बात का है कि मीडिया ने इस ओर पूरा ध्यान नहीं दिया और ये सोचने वाली बात है कि क्या सभी आजादी से अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं। प्रोफेसर व पूर्व मुखिया डॉ. धनवंत कौर ने भी अपने विचार दिए।
राजगायक हंसराज हंस को सम्मानित करते पीयू के वीसी डॉ. जसपाल सिंह।