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पतियों के प्रभाव से मुक्त हों महिला जनप्रतिनिधि
भास्कर न्यूज - अजमेर
राज्य सरकार राजनीति में आने वाली महिलाओं व पुरुषों के लिए पढ़े-लिखे होने की अनिवार्यता लागू करे। जो महिलाएं वार्डपंच से लेकर सरपंच व प्रधान बनी हैं, ग्राम पंचायतों व पंचायत समितियों में बैठकर काम संपादन करने के दौरान पतियों के बैठने की परंपरा पर लगाम लगनी चाहिए तभी महिलाएं सशक्त हो सकेगी और राजनीति में आगे बढ़ पाएगी।
पंचायतराज के प्रतिनिधियों ने यह विचार मेरवाड़ा एस्टेट में जेंडर संवेदी शासन विषयक दो दिवसीय जिला स्तरीय कार्यशाला में व्यक्त किए। श्रीनगर प्रधान रामनारायण गुर्जर, पीसांगन प्रधान कमलेश पोखरणा समेत अन्य जन प्रतिनिधियों ने कहा कि अधिकतर ग्राम पंचायतों में महिला सरपंचों की जगह उनके
पति ही सरपंच पति के रूप में काम करते हैं,
सरपंच के दस्तखत भी कर देते हैं। जो महिलाएं सरपंच होती है वह घर या खेती का कामकाज निपटाने में ही रहती हैं।
कुछ प्रतिनिधियों ने महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने का मुद्दा उठाया। इन्होंने कहा कि ग्राम पंचायतों व पंचायत समितियों की साधारण सभा की बैठकों में उन्हें सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए। प्रतिनिधियों ने योजनाओं को लेकर भी सुझाव दिए।
जिला परिषद अजमेर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सीआर मीणा, भीलवाड़ा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रामपाल शर्मा, जिला परिषद के एकाउंट आफिसर केजी सोमानी, उपजिला शिक्षा अधिकारी प्रदीप मेहरोत्रा, उपजिला शिक्षा अधिकारी भगवती प्रसाद, मुख्य आयोजना अधिकारी बीना वर्मा एवं डॉ$ सुनीता टेकचंदानी ने भी अलग-अलग विषयों पर जन प्रतिनिधियों को जानकारी दी तथा उन्हें अपने अधिकारों का उपयोग करने की सीख दी।
उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में आंगनबाड़ी, चिकित्सा, आयुर्वेद, कृषि पर्यवेक्षक समेत अन्य सेवाओं पर पंचायत का सीधा हस्तक्षेप है पर अधिकारों की जानकारी नहीं होने के कारण वह इन पर अंकुश नहीं लगा पाते और न ही पर्यवेक्षण कर पाते हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका, साथिन व कृषि पर्यवेक्षक को तो तनख्वाह ही तभी मिल पाती है, जब सरपंच उनकी उपस्थिति का सत्यापन करते हैं। कार्यशाला का संचालन वर्तिका शर्मा ने किया।