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डाउनलोड करेंअजमेर। पथरी की शिकायत लेकर आए मरीज का ऑपरेशन कर उसकी किडनी निकाल लेने के मामले में निचली अदालत द्वारा प्रथम दृष्टया दोषी ठहराए गए डॉ रोहित अजमेरा को सेशन कोर्ट से राहत मिल गई है। सेशन कोर्ट ने अजमेरा की ओर से दायर याचिका मंजूर करते हुए निचली अदालत के प्रसंज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया है।
डॉ रोहित अजमेरा के वकील अनिल नाग ने बताया कि केकड़ी निवासी सुखपाल उर्फ सुखलाल ने 5 मई 2011 को शिकायत दर्ज कराई थी। सुखपाल का कहना था कि 2008 में उसे पेट में तकलीफ हुई तो डॉ सुरेश से जांच कराई, उन्होंने बताया कि किडनी में पथरी है। 28 मार्च 2009 को किडनी में पथरी के ऑपरेशन के लिए सुखदेव ने जेएलएन अस्पताल के यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के डॉ रोहित अजमेरा से संपर्क किया।
सुखदेव के अनुसार डॉ अजमेरा ने मामूली ऑपरेशन कर पथरी निकालने का आश्वासन दिया। 2 अप्रैल 2009 को डॉ अजमेरा ने सुखदेव का ऑपरेशन किया। लंबे समय तक पेट में दर्द रहने पर सुखदेव ने जयपुर के एसएमएस अस्पताल में डॉ संदीप निझावन से जांच कराई तो पता चला कि उसकी दाहिनी किडनी ही नहीं है।
यह जानकर सुखदेव हैरान रह गया क्योंकि उसने ना तो किडनी निकालने की परमिशन दी थी और ना ही डॉ अजमेरा ने उसे बताया था कि उसकी किडनी निकाली गई है। पुलिस ने इस मामले में एफआर दे दी थी, जिसे सुखदेव ने अदालत में विरोध याचिका के जरिए चुनौती दी। सुखदेव व एक अन्य के बयान के आधार पर निचली अदालत ने डॉ अजमेरा को आईपीसी की धारा 336 व 204 के तहत प्रथम दृष्टया दोषी ठहराते हुए माना कि उन्होंने मरीज के जीवन को खतरे में डाल दिया।
डॉ अजमेरा को वारंट से तलब किया गया। निचली अदालत के आदेश को डॉ अजमेरा ने वकील अनिल नाग के जरिए सेशन कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जैकब मैथ्यू के मामले में दिए गए निर्णय को आधार मानते हुए अदालत ने कहा कि डॉ अजमेरा ने सुखदेव के जीवन को संकट में डाला हो ऐसा प्रथम दृष्टया साबित नहीं होता है। एसएमएस अस्पताल के डाक्टरों के एक बोर्ड ने भी मामले की जांच कर डॉ अजमेरा को निर्दोष ठहराया था। इन सभी बिंदुओं का हवाला देते हुए न्यायाधीश उमेश शर्मा ने डॉ अजमेरा की याचिका मंजूर कर निचली अदालत का आदेश निरस्त कर दिया है।
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