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शांति चाहिए तो मन को संकल्प और विकल्पों से मुक्त करें
अजमेर. आर्यिका विभा माता ने कहा कि पानी का स्वभाव तो मनुष्य के मन की तरह है। कंकर मारने से पानी हिलने लगता है और कुछ समय बाद स्थिर हो जाता है। जब मनुष्य क्रोध का आवरण ओढ़ता है तो उसकी स्थिति भी उसी कंकर वाले पानी की तरह हो जाती है। यही स्वभाव मानव मन का होता है, हलचल होगी तो धुंधलापन छा जाता है और मन के शांत होते ही अपने आप स्वच्छ हो जाता है। माता ने कहा कि एक कार्य को छोड़कर दूसरे में मन लगाओगे तो व्यक्ति पहले कार्य से अपने आप मुक्त हो जाता है। आर्यिका विभा शनिवार को नए धड़े की नसियां में लोगों को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि अगर मन की शांति चाहिए तो मनुष्य को सबसे पहले मन को संकल्प और विकल्पों से दूर करना होगा। मन की हलचल समाप्त होते ही चित्त में शांति और प्रसन्नता छा जाएगी और मन के कायाकल्प से जीवन स्वर्ग हो जाएगा।