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गण के लिए तंत्र का मजबूत होना जरूरी

8 वर्ष पहले
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अलवर। राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस सेलिब्रेशन के लिए जिला तैयार है। तमाम सरकारी महकमों और निजी संस्थाओं में उत्सव की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। राष्ट्रीय पर्व की पूर्व संध्या पर दैनिक भास्कर ने शहर के आम आदमी से बात कर जाना कि वे खुद को इस सिस्टम में कहां पाते हैं, सिस्टम के प्रति उनका नजरिया क्या है तथा इसकी बेहतरी के लिए उनके सुझाव क्या हैं?

खतरों के बीच आगे बढ़ रहीं महिलाएं

आजादी के इतने दशकों बाद भी बुनियादी समस्याएं बरकरार हैं। देश आगे बढ़ तो रहा है लेकिन इसकी स्पीड और बढ़ानी होगी तभी हमें सदियों की गुलामी से मिले पिछड़ेपन से निजात मिल पाएगी। कमजोर राजनीतिक सोच के कारण अप्रासंगिक हो चुके कानून महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा नहीं दिला पा रहे। गनीमत है इन सबके बावजूद महिलाएं पढ़-लिखकर अपना प्रभावी मजबूत समाज के सामने ला रही हैं।

हेम शर्मा, प्रिंसिपल एसएमडी स्कूल

हल्की बातों के बजाय हो वजनदार काम

आजकल लाइम लाइट में बने रहने के लिए सादगी का आवरण ओढऩे का प्रयास हो रहा है। समस्याएं ऑटो में आने-जाने या सड़कों पर बैठने से अधिक ठोस निर्णय लेने से हल होंगी। महज बातों से कुछ नहीं होने वाला, चाहे आम हों या खास सबको मिलकर सुधार की राह पर चलना होगा, वजनदार काम करने होंगे।

व्याख्याता सुशील नांदल, बुध विहार

रिश्वतखोरी के खिलाफ खड़े हों सभी

सिस्टम में आम आदमी को अपने वाजिब काम कराने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ती है। रिश्वतखोरी को मिल रही सामाजिक मान्यता सिस्टम को खोखला कर रही है। हालांकि आजकल मोबाइल सहित अन्य तकनीकी माध्यमों से इनका खुलासा भी हो रहा है लेकिन इसे एक अभियान के रूप में अपनाकर आमजन को भी सीधे जोडऩे की दरकार है।

इंदुबाला, स्कीम आठ

वाह-वाही छोड़ मर्म समझें

जो सक्षम हैं वो वाह-वाही लूटने के चक्कर में लाइम लाइट में रहने का प्रयास करते हैं। असली मर्म को समझने की कोशिश कोई नहीं करता। बदलाव के नारों से निकले नेता अक्सर पावर में आते ही जनता को भूल जाते हैं। कम से कम इन दिनों तो ऐसा ही हो रहा है। हालांकि इन सबके बीच युवा भारत तेजी से दुनिया में अपनी ताकत के साथ उभर रहा है, महिलाओं की दशा भी सुधरी है।



विजय दीक्षित, हिंदी व्याख्याता

सिविल में भी हो फौज सा अनुशासन

सेना से रिटायर हुए करीब 25 वर्ष हो गए हैं। फौज में थे तो कोई समस्या नहीं थी लेकिन जैसे ही सिविल लाइफ से जुड़े, हकीकत भयावह लगी। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरा गई हैं, जिम्मेदार हम सब ही हैं। भ्रष्टाचार खात्मे का नारा लेकर जो सत्ता में आए वो छोटी-छोटी बातों पर सड़क पर आ रहे हैं। स्थिति सड़कों पर बैठने से नहीं सिस्टम को मजबूत बनाने से सुधरेगी। अच्छी बात ये है कि नई पीढ़ी कुछ गलत हो तो तीखी प्रतिक्रियाएं देने लगी है।

कर्नल रघुवीर सिंह चौधरी, मोती डूंगरी

स्थाई रोजगार के लिए बने प्रभावी नीति

बेरोजगारी की समस्या युवाओं को निराश कर रही है। गली-मोहल्लों में प्रोफेशनल डिग्रियों के कालेज तो खूब खुल रहे हैं लेकिन स्थाई रोजगार नीति के बारे में आज तक गंभीर मंथन नहीं हुआ। अस्थाई रोजगारों से किसी का भला नहीं होता, मानव संसाधनों का सही उपयोग नहीं किया गया तो हालात चिंताजनक हो जाएंगे।

हिमांशु चौधरी, स्कीम पांच



प्रारंभिक शिक्षा से न हो खिलवाड़

शिक्षा में सुधार के लिए कई आयोग तो बने लेकिन उनकी रिपोर्टों पर धूल जम गई। पांचवीं-आठवीं कक्षाओं में बोर्ड परीक्षा समाप्त कर एलिमेंट्री एजुकेशन को बुनियादी तौर पर कमजोर किया जा रहा है। विकास का पहला आधार शिक्षा है, नई पीढ़ी बेहतर आईक्यू वाली है इसलिए उसी आधार पर शिक्षा ढांचा मजबूत किया जाना चाहिए।

मुसद्दीलाल यादव, शिक्षक तिजारा फाटक





प्रारंभिक शिक्षा से न हो खिलवाड़

॥शिक्षा में सुधार के लिए कई आयोग तो बने लेकिन उनकी रिपोर्टों पर धूल जम गई। पांचवीं-आठवीं कक्षाओं में बोर्ड परीक्षा समाप्त कर एलिमेंट्री एजुकेशन को बुनियादी तौर पर कमजोर किया जा रहा है। विकास का पहला आधार शिक्षा है, नई पीढ़ी बेहतर आईक्यू वाली है इसलिए उसी आधार पर शिक्षा ढांचा मजबूत किया जाना चाहिए।

मुसद्दीलाल यादव, शिक्षक तिजारा फाटक

स्थाई रोजगार के लिए बने प्रभावी नीति

॥बेरोजगारी की समस्या युवाओं को निराश कर रही है। गली-मोहल्लों में प्रोफेशनल डिग्रियों के कालेज तो खूब खुल रहे हैं लेकिन स्थाई रोजगार नीति के बारे में आज तक गंभीर मंथन नहीं हुआ। अस्थाई रोजगारों से किसी का भला नहीं होता, मानव संसाधनों का सही उपयोग नहीं किया गया तो हालात चिंताजनक हो जाएंगे।

हिमांशु चौधरी, स्कीम पांच



सिविल में भी हो फौज सा अनुशासन

॥सेना से रिटायर हुए करीब 25 वर्ष हो गए हैं। फौज में थे तो कोई समस्या नहीं थी लेकिन जैसे ही सिविल लाइफ से जुड़े, हकीकत भयावह लगी। सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरा गई हैं, जिम्मेदार हम सब ही हैं। भ्रष्टाचार खात्मे का नारा लेकर जो सत्ता में आए वो छोटी-छोटी बातों पर सड़क पर आ रहे हैं। स्थिति सड़कों पर बैठने से नहीं सिस्टम को मजबूत बनाने से सुधरेगी। अच्छी बात ये है कि नई पीढ़ी कुछ गलत हो तो तीखी प्रतिक्रियाएं देने लगी है।

कर्नल रघुवीर सिंह चौधरी, मोती डूंगरी



वाहवाही छोड़ मर्म समझें

॥जो सक्षम हैं वो वाह-वाही लूटने के चक्कर में लाइम लाइट में रहने का प्रयास करते हैं। असली मर्म को समझने की कोशिश कोई नहीं करता। बदलाव के नारों से निकले नेता अक्सर पावर में आते ही जनता को भूल जाते हैं। कम से कम इन दिनों तो ऐसा ही हो रहा है। हालांकि इन सबके बीच युवा भारत तेजी से दुनिया में अपनी ताकत के साथ उभर रहा है, महिलाओं की दशा भी सुधरी है।

विजय दीक्षित, हिंदी व्याख्याता



रिश्वतखोरी के खिलाफ खड़े हों सभी

॥सिस्टम में आम आदमी को अपने वाजिब काम कराने के लिए भी जद्दोजहद करनी पड़ती है। रिश्वतखोरी को मिल रही सामाजिक मान्यता सिस्टम को खोखला कर रही है। हालांकि आजकल मोबाइल सहित अन्य तकनीकी माध्यमों से इनका खुलासा भी हो रहा है लेकिन इसे एक अभियान के रूप में अपनाकर आमजन को भी सीधे जोडऩे की दरकार है।

इंदुबाला, स्कीम आठ



हल्की बातों के बजाय हो वजनदार काम

॥आजकल लाइम लाइट में बने रहने के लिए सादगी का आवरण ओढऩे का प्रयास हो रहा है। समस्याएं ऑटो में आने-जाने या सड़कों पर बैठने से अधिक ठोस निर्णय लेने से हल होंगी। महज बातों से कुछ नहीं होने वाला, चाहे आम हों या खास सबको मिलकर सुधार की राह पर चलना होगा, वजनदार काम करने होंगे।

व्याख्याता सुशील नांदल, बुध विहार



खतरों के बीच आगे बढ़ रहीं महिलाएं

॥आजादी के इतने दशकों बाद भी बुनियादी समस्याएं बरकरार हैं। देश आगे बढ़ तो रहा है लेकिन इसकी स्पीड और बढ़ानी होगी तभी हमें सदियों की गुलामी से मिले पिछड़ेपन से निजात मिल पाएगी। कमजोर राजनीतिक सोच के कारण अप्रासंगिक हो चुके कानून महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा नहीं दिला पा रहे। गनीमत है इन सबके बावजूद महिलाएं पढ़-लिखकर अपना प्रभावी मजबूत समाज के सामने ला रही हैं।

हेम शर्मा, प्रिंसिपल एसएमडी स्कूल