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आचार से शोभित होती है विद्या और कला : महाश्रमण
भास्कर न्यूज - बीकानेर
आचार्य महाश्रमण ने कहा कि आचार से विद्या और कला शोभित होती है।आचार प्रथम धर्म है, विद्वता बाद में है। विद्वता अच्छी है, प्रशंसा लायक है पर अहंकार मुक्त विद्वता हो। आचार का ही एक अंग विद्वता है। हम ज्ञान सम्पन्न, विद्वता सम्पन्न बनें लेकिन आचार की उपेक्षा न करें। तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें आचार्य महाश्रमण शुक्रवार को तेरापंथ भवन में ‘आचार से शोभित विद्या और कला’ विषय पर प्रवचन दे रहे थे।आचार्यश्री ने कहा कि हमारे जीवन में आचार और विद्या का महत्व है, लेकिन इनमें पहले किसका महत्व है इस पर विचार करना जरुरी है। आचार का महत्व ज्यादा है जीवन में। जहां आचार संबंधी बात है वहां ज्ञान का पहला स्थान है। साधु के पांच महाव्रत का होना आचार है लेकिन पांच महाव्रत क्या होते हैं, कैसे होते हैं इसका ज्ञान होना भी जरूरी है। दीक्षा से पहले शिक्षा लेनी आवश्यक है। दीक्षा लेने से क्या होता है, दीक्षा लेने के बाद क्या किया जाता है इसका ज्ञान होना जरुरी है। उन्होंने कहा कि इच्छा का अंत नहीं है ये तो आकाश के समान अनन्त है। आवश्यकता पूर्ति अलग बात है लेकिन आकांक्षाओं को छोड़ो। पहले आचार और विनय को महत्त्व दें फिर गुणवत्ता का विकास और उपयोगिता बढ़ाए। नहीं तो जीवन बेकार है।
महाश्रमण ने कहा कि गाय सीधी हो और दूध न दे तो वह किसी काम की नहीं। दूध देने वाली गाय यदि लात भी मारे तो भी वह बहुत काम की होती है और जो गाय दूध भी दे और लात भी न मारे उसका तो कहना ही क्या है। व्यक्ति में कार्य और सेवा यदि विनयपूर्वक हो तो उसकी महानता दिखलाई देती है। आरंभ में मंत्री मुनि सुमेरमल स्वामी ने कहा कि जो गुरुओं की शिक्षा अपने जीवन में उतार ले वह अपने को धन्य बना लेता है। उन्होंने पाप से बचने की बात करते हुए कहा कि जो पाप से बचता है वो धार्मिक है। धार्मिक व्यक्ति व्यवहार और अध्यात्म में भी सफल होता है। धार्मिक बने हो तो ग्रंथि बंधन न हो। ग्रंथि बंधन करते गए तो धार्मिक जीवन की सफलता नहीं।
इस मौके पर मुनियों ने महाश्रमण का अभिनंदन किया। मुनि सुमति कुमार ने कहा कि संसार पक्षीय जन्मभूमि में गुरुदेव के दर्शन कर सुख की अनुभूति हुई है। तेरापंथी आचार्यों की पहचान है वह श्रम निष्ठ होते हैं। तेरापंथ में ऐसे आचार्य हमें प्राप्त हुए यह हमारा सौभाग्य है। मुनि मुकुल कुमार ने कहा कि प्राचीनकाल में जिस तरह राम राज्य सर्वोत्कृष्ट हुआ और उस युग को स्वर्णिम युग कहा गया है उसी तरह महाश्रमणजी के शासन को भी स्वर्ण युग कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मुनि जयंत कुमार ने कहा कि जब आचार्य का यहां मंगलप्रवेश हुआ तब लोग उत्साह और जोश से भरे दिखे और इतनी सर्दी में भी महा श्रमणजी की वाणी सुनने को आतुर हैं। अभिनंदन की कड़ी में मुनिश्री संभव कुमार ने मुक्तक ‘सारे जहां में तेरा जलवा कमाल देखा और पूरा होता सबका सवाल देखा, गया न कोई खाली तुम्हारे दर से गुरुकृपा से निहाल होते देखा’ सुनाकर मन में गुरुभक्ति की भावना व्यक्त की। मुनि परमानन्द, मुनि राजकरण स्वामी, शासन मुनि रविन्द्र कुमार तथा मुनि यशवंत कुमार आदि साधुजन ने अपने विचार व्यक्त कर आचार्यश्री महाश्रमण का अभिनंदन किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार व जैल लूणकरण छाजेड़ ने किया।