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प्रभाकर से जुड़ा है शहर का गहरा रिश्ता

8 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज - बीकानेर
‘विष्णु प्रभाकर’ नाम सुनते ही देश-दुनिया में उनके हजारों पाठकों, प्रशंसकों के चेहरे पर एक खास श्रद्धा का भाव उभरता है। बीकानेर के साथ भी उनका गहरा रिश्ता रहा है। अपने निकट परिजन के यहां कई बार आते रहे और बीकानेर के साहित्यकारों, साहित्य प्रेमियों के साथ खूब संवाद किया, समय बिताया। उनके साथ बिताएं क्षणों की बातें करने वाले सैकड़ों हैं। शायद प्रभाकर के शहर से इस जुड़ाव को देखते हुए उनकी जन्म शताब्दी के मौके पर साहित्य अकादमी ने बीकानेर में दो दिनी राष्ट्रीय सेमिनार करने का निर्णय लिया। देश के कई हिस्सों से वरिष्ठ साहित्यकार, अनुवादक, आलोचक बीकानेर में जुटे। शुक्रवार को सेमिनार शुरू हो गया और वेटेरनरी कॉलेज के ऑडिटोरियम में अनौपचारिक से लेकर औपचारिक आलेखों-भाषणों में बीकानेर से विष्णु प्रभाकर के रिश्ते की चर्चाएं भी खूब हुई।
प्रभाकर की कहानियों पर आलेख पढऩे से पहले बुलाकी शर्माने वह संस्मरण सुनाया जब मालचंद तिवाड़ी के साथ मिलकर यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ के घर पहला साक्षात्कार रिकॉर्ड किया था। जब सुनने बैठे तो पता चला कि टेप रिकॉर्डर में कुछ रिकॉर्ड ही नहीं हो पाया। कवि-कथाकार मालचंद तिवाड़ी हो या श्रीलाल मोहता, सरल विशारद, हो या श्रीलाल जोशी। हर कोई औपचारिक-अनौपचारिक बातों में बीकानेर में प्रभाकरजी से जुड़े संस्मरण सुनाते रहे।
अस्थिरोग विशेषज्ञ डा.शशिकांत अग्रवाल अपने मौसा प्रभाकर के व्यक्तित्व की बात करते ही रोमांचित होते हैं। कहते हैं, वे बहुत एकाग्र होकर लिखते-पढ़ते थे और पढऩे को प्रेरित भी करते। बहुत छोटे होने के बावजूद उनसे चर्चा करने लगते तो जिज्ञासाएं तो शांत करते लेकिन नसीहत देते, पढ़ते कम हो। पढ़ा करो। उसके बाद चर्चा किया करो। अग्रवाल कहते हैं, अपनी प्रसिद्ध कृति ‘आवारा मसीहा’ को अंतिम रूप उन्होंने यहीं रहते हुए दिया। अपने साढ़ूभाई और मेरे पिताजी डा.आर.एस.अग्रवाल के साथ खूब पटरी बैठती। दोनों ही खाने, घूमने के शौकीन थे और बीकानेर में इसका जमकर लुत्फ उठाते।
प्रभाकर की जन्म शताब्दी के मौके पर बीकानेर में राष्ट्रीय संगोष्ठी होने से उनसे जुड़े सभी लोग खुश तो हैं लेकिन आयोजन में श्रोताओं की सीमित संख्या से हैरान भी।