‘संस्कार ही सबसे बड़ी संपदा’
भास्कर न्यूज. बीकानेर
तेरापंथ धर्म संघ के 11वें अधिशास्ता आचार्यमहाश्रमण ने शनिवार को तेरापंथ भवन में ‘सुविनीत कौन?’ विषय पर प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि विनीत होता है उसे संपदा मिलती है और अविनीत होता है उसे विपदा। जो विद्यार्थी इस बात को समझ ले वह शिक्षा प्राप्त कर लेता है। माता-पिता अपनी संतान को छोटी उम्र में ही विद्या संस्थान भेज देते हैं। वे सोचते हैं कि ज्यादा वर्ष तक विद्या संस्थान में रहेगा तो आत्मनिर्भर बनेगा, कमाई के लायक बन जाएगा। ऐसी उम्मीद रखकर अभिभावक अपने बच्चों को शाला भेजते हैं, लेकिन यदि वह शिक्षण संस्थान उन्हें संस्कार और ज्ञान नहीं देता है तो वह संस्थान असफल है। आचार्यश्री ने कहा कि आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला शत्रु है और परिश्रम के समान कोई बंधु नहीं। सुविनीत वही हो सकता है जिसमें अच्छे संस्कार हो, जो शिष्य गुरु की आज्ञा का पालन विनम्रता से करता है। गुरु के साथ-साथ सभी से शिष्ट व्यवहार हो। जो स्वभाव से शांत होता है और दूसरों को सम्मान देता है, दूसरों की अधीनता में भी औचित्य के साथ रहे वही व्यक्ति सुविनीत होता है। सुविनीत वह होता है जिसके विचार सादगी और उन्नत भरे हो। विद्यार्थी को विद्या के क्षेत्र में बेईमानी से बचना चाहिए। गोपालकृष्ण गोखले की बाल्यकाल की कहानी सुनाते हुए महाश्रमणजी ने कहा कि प्रामाणिकता और प्रतिभा से ही व्यक्ति महान् बनता है। संस्कारों की संपदा के सामने धन-वैभव बौने हो जाते हैं। शुद्ध-बुद्धि कामधेनू की तरह होती है। बुद्धि और शुद्धि दोनों बहनें हैं, ये साथ में रहनी चाहिए।
आचार्यश्री महाश्रमणजी के प्रवचन से पूर्व तेरापंथ किशोर मंडल की ओर से ‘संस्कार समृद्धि’ विषयक कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में जैन गल्र्स कॉलेज के वाणिज्य व्याख्याता डॉ. धनपत रामपुरिया ने कहा कि धरती पर जितने जीव हुए हैं उनमें मनुष्य को श्रेष्ठ माना गया है। श्रेष्ठ कर्मों का परिणाम ही होता है जो हमें मनुष्य जन्म मिलता है और यह जन्म श्रेष्ठ इसलिए होता है क्योंकि सोचने-समझने की ताकत केवल मनुष्य में ही होती है। इसलिए किशोर मंडल में संस्कार सिखाए जाते हैं। रामपुरिया ने कहा कि किशोरों को यदि क्रांति पुरुष बनना है तो कार नहीं संस्कार अपनाएं, व्यापार से पहले व्यवहार धारण करें। महाश्रमणजी विनय-संस्कार से भरे हैं। बिंदू से सिन्धु को प्राप्त करना है तो विनम्रता आवश्यक है। पहाड़ पर चढ़ते समय हमें झुकना पड़ता है और सिर ऊपर रखकर ही उतरा जाता है। कार्यशाला का संचालन दिनेश सोनी ने किया। कार्यशाला से पूर्व मनोज छाजेड़ ने गीतिका प्रस्तुत की। मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि जीवन के प्रारंभ में संस्कार सबसे पहले आते हैं और शिक्षा बाद में। सीखा हुआ ज्ञान भूल सकते हैं लेकिन अपनाए हुए संस्कार जिंदगीभर रहते हैं। जीवन में संस्कार जन्म से मिलते हैं लेकिन मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि संस्कार गर्भ में ही प्राप्त कर लिए जाते हैं। इसलिए माताओं को चाहिए कि गर्भवती होने के साथ ही उदार, सत्यनिष्ठा, संयमशीलता को व्यवहार में लाएं। जैसा भी व्यवहार आप करेंगी उसका असर आपके गर्भ पर पड़ेगा। बच्चों की पहली पाठशाला उसका घर ही होता है। संस्कार वही दे सकता है जिसका जीवन संस्कारी हो। जिस व्यक्ति में धार्मिक संस्कार है वह धन, वैभव सब ठुकरा सकता है। बेईमानी से आए हुए धन की जड़ नहीं होती, जड़ होती है ईमानदारी, धर्म, नैतिकता की। छल-कपट, किसी को दुखी करके कमाया हुआ धन सुख नहीं विपदा लाता है।
महाश्रमण के स्वागत में गीतिका की प्रस्तुति
आचार्यश्री महाश्रमणजी के अभिनंदन शृंखला में गंगाशहर की साध्वियों ने ‘आई आज उषा खुशहाल’ गीतिका प्रस्तुत की। साध्वीश्री सोमलता ने अभिनंदन करते हुए कहा कि अपनी जन्मभूमि पर महाश्रमणजी का स्वागत कर सुख की अनुभूति हो रही है।
महिला सम्मेलन २८ को
तेरापंथ महिला मंडल की संतोष बोथरा ने बताया कि एक विराट महिला सम्मेलन का आयोजन 28 जनवरी को रखा गया है। सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए 27 जनवरी को रजिस्ट्रेशन किया जाएगा।