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षड्यंत्रपूर्वक घटाया क्रांतिकारियों का कद

8 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज.बीकानेर

आजादी के लिए हुए क्रांतिकारी आंदोलन पर विशेष काम करने वाले साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी का कहना है, गढ़े हुए नेताओं ने हमारे क्रांतिकारियों का कद षड्यंत्रपूर्वक घटाने की कोशिशें की। अगर उनका वास्तविक काम सामने आता तो कई नेता बौने साबित हो जाते।

केन्द्रीय साहित्य अकादमी की राष्ट्रीय संगोष्ठी में शिरकत करने आए विद्यार्थी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, यशपाल ने संस्मरणों में घालमेल कर भी क्रांतिकारियों के कद से खिलवाड़ की। भगतसिंह शोषण विहीन समाज के जिस स्वरूप को साकार करना चाहते थे उसका व्यापक पैमाना था। सिर्फ देश में ही एक-दूसरे देश भी किसी का शोषण नहीं कर सके, यह परिकल्पना थी। 1857 से 1946 तक के संपूर्ण क्रांतिकारी संघर्ष पर काम करने के दौरान जो बातें सामने आई वे साबित करती है कि भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का सही मूल्यांकन नहीं हुआ। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर विशेष बातचीत में विद्यार्थी ने माना कि क्रांतिकारियों पर बनी फिल्मों में उनके चरित्र का सही प्रस्तुतिकरण नहीं हो सकता। बॉलीवुड सिर्फ फिल्म को हिट करवाने के लिए ही फिल्म में क्रांति का छौंक लगाता है।

साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसा हो रहा है। यहां कई अच्छे लेखकों को उचित अभिव्यक्ति और सम्मान नहीं मिल पाता। ऐसे में अपने इस लेखन के क्षेत्र में भी हमें क्रांतिकारी आंदोलन की तरह ही संघर्ष करना होगा।

अच्छे नाटकों के लिए दर्शकों

की कमी नहीं

वरिष्ठ नाटककार प्रताप सहगल का कहना है, नाटक के लिए दर्शकों की कमी नहीं बशर्ते पूरी गंभीरता से रंगकर्म किया जाए। उदाहरण देते हैं, दिल्ली में रोजाना दो-तीन नाटक होते हैं। टिकट के लिए लाइन लगती है। जरूरत इस बात की है कि निर्देशक-लेखक के बीच की दूरी कम हो। निर्देशक थोड़ा दायरे से बाहर निकले वहीं लेखक को भी घर से बाहर निकलकर रंग-मंडलियों के पास जाना पड़ेगा। मंचन के कई तरीके उन्हें समझाने पड़ेंगे। हिंदी का नाटककार अभी भी नाटक को कहानी की तरह लिखता है।नुक्कड़ नाटक के महत्व और जरूरत पर बात करते हुए कहा, ये नाटक राजनैतिक व तात्कालिक मुद्दे के प्रति चेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण है। बिना तामझाम के सीधी बात कह देते हैं। सहगल ने माना कि दर्शकों का अभाव नहीं होने के बावजूद हिंदी रंगमंच अर्थाभाव से जूझ रहा है। प्रस्तुति का खर्च नहीं निकल पाता। ऐसे में शौकिया रंगमंच से काम नहीं चलेगा।

साहित्यिक राजनीति में अच्छे

लेखक नजरअंदाज

हिंदी के लेखक एवं आलोचक राधेश्याम तिवारी का कहना है, साहित्य में समाई गहरी राजनीति कई अच्छे लेखकों पर भारी पड़ रही है। जो लोग अच्छा लिख रहे हैं लेकिन लाभ पहुंचाने की स्थिति में नहीं उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। साहित्य में पारदर्शिता बनाने के लिए मीडिया को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जरूरत बताई। हिंदी में आलोचना के वर्तमान हालात का जिक्र करते हुए कहा, इसमें ईमानदारी का घोर अभाव है। इसीका दुष्परिणाम है कि पाठक साहित्य से दूर होता जा रहा है। स्थितियों में सुधार के लिए वे अच्छे और ईमानदार लेखकों को सबकुछ सहते लगातार काम करते रहने की जरूरत बताते हैं। इसके लिए फिराक गोरखपुरी का शेर सुनाते हैं ‘इस खंडहर में टूटे हुए दीये हैं बहुत, इन्हीं से काम चलाओ बहुत उदास है रात।’

चर्चा जारी रखने का वादा कर

विदा हुए साहित्यकार

विष्णु प्रभाकर जन्मशतवार्षिकी संगोष्ठी के दूसरे और आखिरी दिन प्रभाकर के साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर जमकर विचार मंथन हुआ। कौशलनाथ उपाध्याय की अध्यक्षता में ‘प्रभाकर के उपन्यास’ विषय पर हुई चर्चा में अनिरुद्ध उम्मट, वत्सला पांडे और पंकज पाराशर ने कई बारीकियां बताईं। उम्मट ने कहा, उनकी कहानियों के पात्र पाठक से विमर्श करना चाहते हैं लेकिन स्वयं प्रभाकर टोक देने को उपस्थित हो जाते हैं। प्रभाकर के जीवनी साहित्य, संस्मरण एवं काव्य पर हुई चर्चा में रमेश ऋषिकल्प, ब्रजरतन जोशी, राधेश्याम तिवारी ने आलेख पढ़े। रामशंकर द्विवेदी ने इस सत्र की अध्यक्षता की। दिविक रमेश, रश्मि भार्गव एवं प्रत्युष गुलेरी ने विष्णु के बाल साहित्य पर चर्चा की। प्रकाश मनु ने इसकी अध्यक्षता की। प्रताप सहगल की अध्यक्षता में हुए आखिरी सत्र में नाटक, एकांकी एवं यात्रावृत्त विधा पर आलेख पढ़े गए। राजेन्द्र जोशी ने ‘प्रजातांत्रिक नाटककार’ आलेख में नाटककार प्रभाकर के लेखन की कई बारीकियों का जिक्र किया। फूलचंद मानव, सुरेश्वर त्रिपाठी और रामजी बाली ने आलेख पढ़े। दो दिन की इस संगोष्ठी के साथ ही बीकानेर से विदा होते साहित्यकारों का एक ही मत था, संगोष्ठी का समापन हुआ है। चर्चा चलती रहनी चाहिए। प्रभाकर के रचनाकर्म से जुड़े कई अनछुए-अनछुए पहलुओं पर बात करते हुए साहित्य को समृद्ध करने की जरूरत है। संयोजक ब्रजमोहन जोशी, अकादमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी आदि ने साहित्यकारों का आभार जताया।

साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी ने कहा, यशपाल ने संस्मरणों में घालमेल कर क्रांतिकारियों के कद से खिलवाड़ किया