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निशक्त लोगों की रक्षा का एक्ट, रियासत बीकानेर, सन् 1941 ई.

7 वर्ष पहले
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बीकानेर नरेश महाराजा गंगासिंह की सरकार की नीति यह रही थी कि राज्य के अधिकांश-जन की भलाई हो। यही कारण था कि उनके समय में प्रजाहित के जितने कार्य हुए उतने पहले कभी नहीं हुए। जनकल्याण के अपने कार्यों को विस्तार प्रदान करते हुए उन्होंने सन् 1941 में एक ऐसा कानून पारित किया जो मुख्यतया शारीरिक दृष्टि से अक्षम लोगों को सहायता पहुंचाने का प्रयास था।इस एक्ट को 20 दिसंबर, सन् 1941 ई. को पारित किया गया था। यह इस वर्ष का पारित होने वाला छठा एक्ट था। इस एक्ट को एक लंबे शीर्षक से पारित किया गया था- ‘अंधों, अपाहिजों तथा दूसरे अशक्त एवं दी लोगों को जो रोग, शारीरिक असमर्थता, दुर्घटना या बुढ़ापे के कारण अयोग्य हों भोजन वस्त्र तथा आश्रय देने तथा और प्रकार से उनका कष्ट निवारण करने के लिए सदन व आश्रम खोलने का एक्ट’। लेकिन संक्षेप में इसे ‘निशक्त लोगों की रक्षा का एक्ट, रियासत बीकानेर सन् 1941 ई.’ कहा गया।
यह एक विस्तृत एक्ट था, जिसमें छोटी सी भूमिका में एक्ट की आवश्यकता स्पष्ट करते हुए कुल 19 धाराएं शामिल की गई थीं। कतिपय धाराएं ऐसी थीं जिन्हें कई उपधाराओं में विभक्त किया गया था। प्रत्येक धारा के सारांश को साथ-साथ एक तरफ लिखा गया था जिससे विषय वस्तु को समझने में आसानी रहे। एक्ट की भूमिका में यह लिखा गया था कि क्योंकि यह मुनासिब है कि अंधों, अपाहिजों तथा दूसरे अशक्त और दीन लोगों को जो लोग शारीरिक असमर्थता, दुर्घटना या बुढ़ापे के कारण अयोग्य हों, भोजन, वस्त्र तथा आश्रय और सहायता देने के लिए सदन व आश्रम खोलने का विधान किया जाए इसलिए नीचे लिखे गए अनुसार कानून बनाया जाता है। ((लगातार))