‘समूह के हितों को प्राथमिकता दें’
भास्कर न्यूज - बीकानेर
आचार्य महाश्रमण ने सोमवार को तेरापंथ भवन गंगाशहर में ‘समूह में कैसे रहें’ विषय पर प्रवचन दिया।
उन्होंने कहा कि मुनि को पृथ्वी की तरह होना चाहिए। पृथ्वी पर कोई भी, कुछ भी करे वह सह लेती है। पृथ्वी जैसी सहनशीलता मुनि में होनी चाहिए। साधु में सब कुछ झेलने की क्षमता होनी चाहिए। आचार्य ने कहा कि समूह की एक छोटी इकाई परिवार होती है। परिवार के सदस्य सहना सीखें, मौके पर कहना सीखें और शांति में रहना सीखें। इसी सूत्र से परिवार में रह सकेंगे। विशेषकर दाम्पत्य जीवन में सहने की अपेक्षा रहती है। समूह में व्यक्तिगत स्वार्थों को गौण और समूह के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। परिवार के हितों के लिए स्वयं के हित भूलने चाहिए, गांव हित के लिए परिवार को, राष्ट्र हित के लिए गांव को और आत्मकल्याण के लिए पृथ्वी को त्यागना पड़ता है। यह सोचें की सबका हित कैसे हो। इस मौके पर उपस्थित युवाओं को आचार्य ने नशा न करने की प्रतिज्ञा दिलाई। कार्यक्रम में बांधाणी गांव से चौधरी परिवार के लोगों ने गुरु धारणा ग्रहण की। आचार्यश्री महाश्रमणजी ने इन्हें जैन धर्म की धारणा दिलाई। इससे पूर्व मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि व्यक्ति अपने परिवार, समाज व देश के लिए उपयोगी बने। उपयोगी सिर्फ ज्ञान से नहीं होता। ज्ञान के साथ उपयोगी बनने के लिए सेवा तथा चरित्र की आवश्यकता है। व्यक्तित्व का विकास संस्कार से और सत्य से होता है।
आचार्य महाश्रमण ने रविवार गणतंत्र दिवस पर ‘गणतंत्र का महामंत्र समर्पण’ विषय पर प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस का भारत के इतिहास में बहुत महत्व है। तेरापंथ धर्म संघ का विधान आचार्य भिक्षु ने लिखा था। आचार्य भिक्षु का योग मर्यादा के साथ जुड़ा है। समर्पण तो आवश्यक है चाहे धार्मिक संगठन हो, सामाजिक संगठन हो या राजनैतिक समर्पित होना ही पड़ता है। समर्पण शासन के प्रति हो, समर्पण शासन पति के प्रति हो।