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‘किसी संप्रदाय से नहीं बंधा अणुव्रत’

7 वर्ष पहले
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बीकानेर - भारत एक ऐसा देश है जहां विभिन्नता का दर्शन होता है। विभिन्न जातियां, विभिन्न भाषा बोलने वाले, विभिन्न संप्रदायों वाले व्यक्ति यहां है। इतनी भिन्नता होते हुए भी सब में एकता है। हम सब भारतीय है और उससे भी पहले मानव हैं। ये उद्गार आचार्य महाश्रमण ने तेरापंथ भवन में अणुव्रत समिति, गंगाशहर की ओर से शनिवार देर रात आयोजित सर्वधर्म सम्मेलन में प्रकट किए।
‘अणुव्रत संप्रदायविहीन’ विषय पर उन्होंने कहा कि अणुव्रत किसी संप्रदाय से बंधा नहीं है। अणुव्रती बनना है तो जरुरी नहीं कि जैन बनो। कोई भी संप्रदाय, किसी भी धर्म से जुड़ा व्यक्ति अणुव्रत को अपना सकता है। अणुव्रत में मानवीय आचार, संयम धारण करना, नशा नहीं करना जैसी बातें हैं जो सभी संप्रदाय और धर्म से जुड़ी है। गुरुदेव तुलसी ने राजस्थान से कन्या कुमारी और कन्या कुमारी से राजस्थान फिर राजस्थान से कोलकाता और पूरी दुनिया में जगह-जगह नैतिकता और संयम का संदेश देकर अणुव्रत की अलख जगाई। आरंभ में मुनि सुमेरमल ने कहा कि धर्म हमारे जीवन को शुद्ध, सरल बनाने वाला तत्व है। धर्म जनजीवन में आता है तो संप्रदाय केवल पहचान के लिए है। सब धर्मों का कहना है स्वयं को शुद्ध करो। प्राणीमात्र के साथ मैत्री रखो। कोई धर्म यह नहीं कहता कि वह सर्वश्रेष्ठ है। सम्मेलन की शुरुआत करते हुए सुरेन्द्र सिंह रैना ने कहा कि बीकानेर की धरती प्रेम और करुणा से भरी है। यहां आचार्य तुलसी, महाप्रज्ञ तथा महाश्रमण आदि कई गुरुओं के पावन कदम पड़े हैं। हाफिज फरमान अली ने कहा कि गुरुदेव ने इंसान को इंसान से जोडऩे का पैगाम दिया है। किसी भी मजहब के अंदर जुल्म, अत्याचार और बेबसों को सताने का नहीं लिखा है। परमात्मा के नाम अनेक हैं लेकिन संदेश एक ही है। पं. रामेश्वरानंद ने कहा कि जहां धर्म है वहां जय है। किसी भी धर्म-ग्रंथ में मर्यादा विहीन शब्द नहीं। अणुव्रत गुलाब का फूल है जो चाहे जैन हो, मुस्लिम हो या सनातनी हो सभी धर्म, वर्ग को एक जैसी ही खुशबू देता है। कार्यक्रम में महापौर भवानीशंकर शर्मा तथा सांसद अर्जुन राम मेघवाल भी उपस्थित थे। अणुव्रत समिति के अध्यक्ष शुभकरण सिंघी ने आगंतुकों का स्वागत किया। आभार राजेन्द्र सेठिया ने प्रकट किया। अणुव्रत समिति के मोहन भंसाली ने सम्मेलन का संचालन किया।