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कठिनाई में करे नवकार मंत्र का जाप : महाश्रमणमहाश्रमण ने ‘आचार्य तुलसी और आगम संपादन’ विषय पर दिया प्रवचन

7 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज, बीकानेर

आचार्य तुलसी जन्म शताब्दी वर्ष के द्वितीय चरण का शुभारंभ गुरुवार को हुआ। दूसरे चरण के पहले दिन आचार्य महाश्रमण ने‘आचार्य तुलसी और आगम संपादन’ विषय पर व्याख्यान दिया। तेरापंथ भवन में महाश्रमण ने कहा कि नियतिवाद और पुरुषार्थ दोनों की मान्यताएं हैं। सृष्टि, दुनिया में नियति का योग है। पुरुषार्थ का भी महत्त्व है। भाग्य भरोसे कभी नहीं बैठना चाहिए। जो लिखा है वह होकर रहेगा यह सत्य है लेकिन पुरुषार्थ पर ही नियति निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि ज्यादा ज्योतिष के चक्कर में न पड़ें। हाथ दिखाना, कुंडली दिखाना तथा भविष्य के बारे में जानने के लिए प्रयत्न करना सही नहीं है। इतना समय भविष्य जानने में लगाएं इससे अच्छा स्वाध्याय करें। जो भी कार्य करें चिंतन पूर्वक करें। कठिनाई हो या संदेह के भाव आएं तो नवकार मंत्र का जाप करें, भिक्षु स्वामी को याद करें। अपने आराध्य को याद करने से सब ठीक हो जाता है। महाश्रमण ने कहा कि आचार्य तुलसी ने जो मन में सपना देखा उसे दृढ़ता से पूरा करने का मानस बनाया। सपना यदि संकल्प बन जाए तो वह पूरा होने की संभावना बन जाती है। आगम संपादन जैसा बड़ा कार्य करने की जो तुलसी ने ठानी थी उसके बारे में उन्होंने स्वयं ने कहा था कि यह इतना लंबा कार्य है जिसे इस जन्म में पूरा करना असंभव है। इसे पूरा करने का पुरुषार्थ हमें करना होगा। विक्रम संवत् 2012 में प्रारंभ हुआ यह संपादन कार्य आज 2070 में भी चल रहा है। तीसरी पीढ़ी इस कार्य में लगी है। महाश्रमणजी ने कहा कि मेरा सौभाग्य है कि मैं इस आगम कार्य से जुड़ गया हूं। आगम स्वाध्याय साधु का भोजन होता है। आगम स्वाध्याय से साधु पोषित होता है, इससे ज्ञान और वैराग्य बढ़ता है। मुझसे पूर्व आचार्य महा प्रज्ञजी ने भी आगम संपादन में बहुत कार्य किया। वे प्राकृत भाषा में विद् थे। व्याकरण हो, दर्शन हो या ग्रंथों संबंधी बात वो हर क्षेत्र में विद्वता रखते थे और बड़े ही सुंदर तरीके से जैन आगमों का संपादन करते थे। ज्ञानी गुणवाद के संपर्क में रहना चाहिए ताकि कुछ सीखा जा सके। उन्होंने कहा कि हमारे संयम की चादर हमें भाग्य से मिली है। इस चादर की हमें निर्मलता बनाए रखनी है। आरंभ में मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि पदार्थ की भावना गौण करोगे तब धर्म करने का लाभ मिलेगा। शुद्धि होते हुए भी हमारी बुद्धि सुख की अनुभूति नहीं कर पाती।