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मुसलमानों के बसाए गांवों में रहते हैं हिंदू और सिख

8 वर्ष पहले
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नगर संवाददाता, श्रीगंगानगर।

गणतंत्र यानी गण का तंत्र, तो भास्कर आज आपको ऐसे ही लोगों से रूबरू करवा रहा है, जिन्होंने सही मायने में गण के तंत्र के मायने समझे और इसकी रक्षा की। भारत-पाक बार्डर पर बसे श्रीगंगानगर जिले के ये एक-दो लोग नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों के हजारों लोग हैं। जो ऐसे गांवों में रहते हैं, जिन्हें आजादी से पहले मुसलमान परिवारों ने बसाया। मुसलमानों के नाम पर गांव का नाम पड़ा, आज वहां एक भी मुसलमान नहीं। फिर भी वहां रह रहे हिंदुओं व सिखों ने गांव का नाम नहीं बदला।

सांप्रदायिक तनाव की बात तो दूर की बात, कई गांवों में हिंदु, सिख और मुसलमान एक साथ मिलकर आपसी त्योहार मनाते हैं। कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जहां प्रेम की इबादत होती है। देखने में वह इमारत मस्जिद की है, लेकिन श्री निशान साहिब वहां गुरुद्वारा होने का अहसास कराते हैं। हर सुबह वहां शबद कीर्तन होता है। ऐसे गांव भी हैं जहां हिंदु और सिख परिवार रहते हैं और पीर बाबा का मेला भरता है।

गांव बसाने वाले मुस्लिम मुखिया की यादों को यूं संजोया

दुलापुर केरी:

यह पूरा गांव कभी मुसलमानों का था और उनके मुखिया का नाम दुले खां था। विभाजन पर यहां के वाशिंदे पाकिस्तान चले गए। गांव में अभी हिंदु और सिख परिवार रहते हैं। गांव में पीर बाबा का मेला भी भरता है।

रेणुका:

आजादी से पहले इस गांव में भी मुसलमानों का वर्चस्व था। इन्हीं के बीच रेणु नाम की मुस्लिम महिला रहती थी। उसी के नाम से गांव रेणुका पड़ा। अभी यहां नायक जाति के लोगों का बाहुल्य है।

फतूही:

खाटलबाना गांव के पास ही फतेहदीन मुसलमान की ढाणी थी। उसके कोई संतान नहीं थी। मरने के बाद भी उसका नाम चलता रहे, इसलिए ग्रामीणों ने गांव का नाम ही फतूही रख दिया।

कालियां:

वर्ष 1900 के आसपास बसाया गया था। इसकी स्थापना कालू मोहम्मद ने की थी। अब गांव में मेघवाल, मजहबी सिख व अरोड़ा बिरादरी ज्यादा है। यहां कच्ची मस्जिद बनी थी, जहां अब गुरुद्वारा बना है।

खखां:

इस गांव में पाहन खखां नाम का मुस्लिम जेलदार था और उसका गांव में पूरा दबदबा था। वह आजादी के समय गांव छोड़ पाकिस्तान चला गया। उसी के गोत्र खखां से गांव खखां का नाम आया। इसी के समीप कोठा गांव में मस्जिद में गुरुद्वारा बना है।

कोनी:

इस गांव को वर्ष 1900 के आसपास कोना खां राठ नाम के मुसलमान ने बसाया था और गांव में ज्यादातर लोग भी मुसलमान ही थे। कोना खां के नाम पर ही कोनी गांव का नामकरण हुआ।

हिरणांवाली:

आजादी के समय यह पूरा गांव मुसलमानों का था और इनमें ज्यादातर लोग गांवों को चराकर जीवनयापन करते थे। इन परिवारों का मुखिया हिणु खां था। आजादी के बाद लोग पाकिस्तान चले गए और गांव हिरणांवाली हो गया।

दौलतपुरा:

वर्ष 1917 के आसपास दौले खां मुसलमान की ढाणी हुआ करती थी। धीरे-धीरे मक्कासर से आए जाट परिवार गांव में रहने लगे और दौले खां गांव छोड़कर चला गया। लेकिन गांव का नाम दौलतपुरा हो गया। तब का बना कुआं व जोहड़ आज भी गांव में है।

मिर्जेवाला:

यहां रहने वाला सबसे पहला व्यक्ति मिर्जा मुसलमान था। उसके गांव छोडऩे के बाद पल्लू के कई परिवार यहां आकर बसे और बारानी जमीन पर काश्त करने लगे। मिर्जा नाम से ही मिर्जेवाला गांव का जन्म हुआ।

ततारसर:

इस गांव का जन्म आजादी के आसपास हुआ था। तूता खां मुसलमान ने इस गांव को बसाया, लेकिन आजादी के बाद वह पाकिस्तान चला गया। लेकिन उसका नाम आज भी कायम है।

पठानवाला:

यहां आने वाला पहला परिवार गनी मोहम्मद पठान मुस्लिम परिवार था। उसके नाम पर गांव पठानवाला पड़ा। आज यहां मुसलमान, जाट व मेघवाल समाज के लोग ज्यादा हैं और सब मिलकर त्योहार मनाते हैं।











दौलतपुरा

वर्ष 1917 के आसपास दौले खां मुसलमान की ढाणी हुआ करती थी। धीरे-धीरे मक्कासर से आए जाट परिवार गांव में रहने लगे और दौले खां गांव छोड़कर चला गया। लेकिन गांव का नाम दौलतपुरा हो गया। तब का बना कुआं व जोहड़ आज भी गांव में है।


गणतंत्र दिवस विशेष

इमारतें मस्जिदों की, गूंजते हैं शबद-कीर्तन

11 वाई, कोनी, कालियां, कोठा। ये वो गांव हैं, जहां मस्जिदों की इमारतों और जगहों पर आज गुरुद्वारे बने हैं और वहां हर रोज शबद-कीर्तन होता है। कोठा गांव में मस्जिद की इमारत में गुरुद्वारा भी है और बगल में पीपल भी, जहां हिंदू बड़ी श्रद्धा से रोज दीप जलाते हैं।

चार भाई और चारों ने बसाया एक-एक गांव

विभाजन से पहले जोधा खां, सागर खां, चानना व घुद्धू खां चार मुस्लिम भाई इसी क्षेत्र में रहते थे। चारों ने एक-एक गांव बसाया। इनमें दो गांव श्रीगंगानगर तहसील में जोधेवाला व सागरवाला हैं। चानना व घूद्धूवाला गांव पदमपुर तहसील में हैं।

श्रीगंगानगर। सरहदी गांव कोठा में विभाजन से पूर्व बनी मस्जिद। अब इसमें गुरुद्वारा स्थापित है।

गांव बसाने वाले मुस्लिम मुखिया की यादों को यूं संजोया

राजेंद्र बतरा - श्रीगंगानगर.

गणतंत्र यानी गण का तंत्र, तो भास्कर आज आपको ऐसे ही लोगों से रूबरू करवा रहा है, जिन्होंने सही मायने में गण के तंत्र के मायने समझे और इसकी रक्षा की। भारत-पाक बार्डर पर बसे श्रीगंगानगर जिले के ये एक-दो लोग नहीं, बल्कि दर्जनों गांवों के हजारों लोग हैं। जो ऐसे गांवों में रहते हैं, जिन्हें आजादी से पहले मुसलमान परिवारों ने बसाया। मुसलमानों के नाम पर गांव का नाम पड़ा, आज वहां एक भी मुसलमान नहीं। फिर भी वहां रह रहे हिंदुओं व सिखों ने गांव का नाम नहीं बदला। सांप्रदायिक तनाव की बात तो दूर की बात, कई गांवों में हिंदू, सिख और मुसलमान एक साथ मिलकर आपसी त्योहार मनाते हैं। कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जहां प्रेम की इबादत होती है। देखने में वह इमारत मस्जिद की है, लेकिन श्री निशान साहिब वहां गुरुद्वारा होने का अहसास कराते हैं। हर सुबह वहां शबद कीर्तन होता है। ऐसे गांव भी हैं जहां हिंदू और सिख परिवार रहते हैं और पीर बाबा का मेला भरता है।



वर्ष 1900 के आसपास बसाया गया था। इसकी स्थापना कालू मोहम्मद ने की थी। अब गांव में मेघवाल, मजहबी सिख व अरोड़ा बिरादरी ज्यादा है। यहां कच्ची मस्जिद बनी थी, जहां अब गुरुद्वारा बना है।



आजादी से पहले इस गांव में भी मुसलमानों का वर्चस्व था। इन्हीं के बीच रेणु नाम की मुस्लिम महिला रहती थी। उसी के नाम से गांव रेणुका पड़ा। अभी यहां नायक जाति के लोगों का बाहुल्य है।



खाटलबाना गांव के पास ही फतेहदीन मुसलमान की ढाणी थी। उसके कोई संतान नहीं थी। मरने के बाद भी उसका नाम चलता रहे, इसलिए ग्रामीणों ने गांव का नाम ही फतूही रख दिया।



इस गांव का जन्म आजादी के आसपास हुआ था। तूता खां मुसलमान ने इस गांव को

बसाया, लेकिन आजादी के बाद वह पाकिस्तान चला गया। लेकिन उसका नाम आज

भी कायम है।

यहां आने वाला पहला परिवार गनी मोहम्मद पठान मुस्लिम परिवार था। उसके नाम पर गांव पठानवाला पड़ा। आज यहां मुसलमान, जाट व मेघवाल समाज के लोग ज्यादा हैं और सब मिलकर त्योहार मनाते हैं।

यहां रहने वाला सबसे पहला व्यक्ति मिर्जा मुसलमान था। उसके गांव छोडऩे के बाद पल्लू के कई परिवार यहां आकर बसे और बारानी जमीन पर काश्त करने लगे। मिर्जा नाम से ही मिर्जेवाला गांव का जन्म हुआ।



इस गांव को वर्ष 1900 के आसपास कोना खां राठ नाम के मुसलमान ने बसाया था और गांव में ज्यादातर लोग भी मुसलमान ही थे। कोना खां के नाम पर ही कोनी गांव का नामकरण हुआ।

आजादी के समय यह पूरा गांव मुसलमानों का था और इनमें ज्यादातर लोग गांवों को चराकर जीवनयापन करते थे। इन परिवारों का मुखिया हिणु खां था। आजादी के बाद लोग पाकिस्तान चले गए और गांव हिरणांवाली हो गया।



गांव में पाहन खखां नाम का मुस्लिम जेलदार था और उसका गांव में पूरा दबदबा था। वह आजादी के समय गांव छोड़ पाकिस्तान चला गया। उसी के गोत्र खखां से गांव खखां का नाम आया। इसी के समीप कोठा गांव में मस्जिद में गुरुद्वारा बना है।