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बेईमानी से सुकून नहीं मिलता

8 वर्ष पहले
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एक आदमी रोज अलसुबह मंदिर में जाता और अत्यंत श्रद्धाभाव से दीपकजलाकर रख देता। मंदिर में उस समय आने वाले लोग उसे देखकर बड़े ही आदर-भाव से भर उठते। एक दिन उससे एक युवक ने पूछा, क्रभाई साहब! आपकी ईश भक्ति सच में प्रणम्य है। आपके जैसा श्रद्धा भाव मैं स्वयं में भी पैदा करना चाहता हूं।ञ्ज उसकी बात सुनकर आदमी हंसकर बोला, क्रभाई! सवाल श्रद्धा का नहीं है। सत्य तो यह है कि एक बार मैं एक मुकदमे में फंस गया। मैंने उस समय भगवान से प्रार्थना की कियदि मैं मुकदमा जीत गया तो रोज मंदिर में आकर दीपक जलाऊंगा। भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली और मैं जीत गया। तभी से मैं अपने वचन का पालन कर रहा हूं।ञ्ज युवक ने मुकदमे के विषय में जानना चाहा तो वह बोला, क्रमैं चाहता था कि मेरे पड़ोसी की उपजाऊ जमीन मेरी हो जाए। मैंने अधिकारियों को रिश्वत देकर वह जमीन अपने नाम पर करा ली। पड़ोसी ने मुझ पर मुकदमा कर दिया, किंतु भगवान की कृपा से मैंने उसे हरा दिया।ञ्ज यह सुनकर युवकके मन मेें उसकेप्रति सम्मान जाता रहा और वह बोला, क्रभगवान ने कैसे तुम्हारे अन्याय में तुम्हारा साथ दिया मैं नहीं जानता, किंतु इस धोखाधड़ी का फल तुम्हें जरूर मिलेगा। पड़ोसी का श्राप तुम्हें लगेगा। वह आदमी व्यंग्य से हंसकर अपनी राह चला गया। युवक ने समझ लिया कि बाहर दीपक जलाने वाले इस आदमी के भीतर का दीपक बुझा हुआ है। बेईमानी से जो उपलब्धि हासिल हो, वह न तो प्रशंसनीय होती है और न ही भीतर का सुकून देती है। वस्तुत: नैतिक रूप से जो गलत है, वह सुख, संतोष और सराहना का पात्र नहीं बन सकता।ञ्ज