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८ साल की भारती ने बोनमैरो देकर बड़े भाई की जान बचाई

8 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज - जयपुर
महज आठ साल की भारती ने बोनमैरो देकर एप्लास्टिक एनीमिया से पीडि़त बड़े भाई अनिल की जान बचा ली। १३ साल का अनिल कई साल से एप्लास्टिक एनीमिया से पीडि़त था। सवाई मानसिंह अस्पताल के बीएमटी सेंटर के डॉक्टरों ने धौलपुर निवासी अनिल का भारती के स्टेम सेल से इलाज किया है। बोनमेरो ट्रांसप्लांट के बाद अब मरीज में हीमोग्लोबिन बनने लगेगा। अनिल की हालत पहले से बेहतर है।जांच के मुताबिक, अनिल का टोटल ल्यूकोसाइट सेल ((टीएलसी)) 300 से बढ़कर 4800 प्रति क्यूबिक मिलीमीटर, प्लेटलेट्स 4000 से बढ़कर एक लाख 60 हजार, न्यूट्रोफिल्स 5 से बढ़कर 70 फीसदी हो गया है।
भारती के पिता श्रीपाल कुशवाह कहते हैं, मेरी आठ साल की बेटी ने जो किया, वह काबिले तारीफ है। बेटे की हालत दिन ब दिन खराब होती जा रही थी। नाक से बार-बार खून आने, चलते-चलते गिर जाने जैसी हालत से परिवार के लोग काफी परेशान थे।




१३ साल का अनिल।

आठ साल की भारती।

२ एलोजेनिक, ५ आटोलोगस बोनमैरो ट्रांसप्लांट

ऐसे करते हैं ट्रांसप्लांट

अस्पताल के अधीक्षक डॉ. वीरेंद्र सिंह ने बताया कि एमएसएस प्रदेश का पहला अस्पताल है, जहां एप्लास्टिक एनीमिया, थैलेसीमिया, ब्लड कैंसर, सिकल सेल एनीमिया एवं बच्चों की जन्मजात आनुवांशिक बीमारियों का इलाज एलोजेनिक बोनमेरो ट्रांसप्लांट से हो सकेगा। अस्पताल में दो एलोजेनिक तथा पांच आटोलोगस बोनमैरो ट्रांसप्लांट हो चुके हैं। मेडिकल ऑन्कोलोजी के हेड डॉ. हेमन्त मल्होत्रा और बीएमटी सेंटर के प्रभारी डॉ. संदीप जसूजा ने बताया कि भाई-बहन का ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव था। ऑटोलोगस में मरीज के शरीर से ही स्टेम सेल लिया जाता है, जबकि एलोजेनिक में मरीज के भाई-बहन, मां-बाप एवं बच्चे की ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन मैचिंग के बाद लिया जाता है। ऑपरेशन में डॉ.अजय यादव, डॉ. हसन, डॉ. लीनू एवं डॉ. दिनेश अग्रवाल का सहयोग रहा।

मरीज की जांच के बाद स्वस्थ डोनर की एचएलए मैचिंग की जाती है। फिर डोनर की बोनमैरो या स्टेम सेल लिया जाता है। मरीज में स्टेम सेल के ट्रांसप्लांट से पहले हाईडोज कीमोथैरेपी से कोशिका को खत्म किया जाता है। ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को यूनिट में 20 दिन तक रखा जाता है।