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छलके श्री, जयजयवंती और शिवरंजनी के सुर

8 वर्ष पहले
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सिटी रिपोर्टर जयपुर
उस्ताद अल्लादिया खां शास्त्रीय संगीत समारोह के दूसरे दिन गुरुवार को जवाहर कला केंद्र में सरोद से छलके राग श्री, जयजयवंती और शिवरंजनी के सुरों ने संगीत रसिकों को आल्हादित कर दिया। मौका था मुंबई के सरोद वादक पं.बृजनारायण की प्रस्तुति का। इस सुरमयी शाम का शुभारंभ बृजनारायण ने संध्याकाल में संधि प्रकाश के वक्त गाए-बजाए जाने वाले प्राचीन राग श्री से किया। इस राग में उन्होंने आलाप, जोड़, झाला के बाद विलंबित एवं द्रुत तीन ताल में दो रचनाओं के माध्यम से सरोद के तारों को झंकृत किया।
इसके बाद उन्होंने राग जय-जयवंती में आलाप के बाद मध्यलय रूपक ताल तथा द्रुत ताल में कई रचनाएं बजाईं। उनका वादन पूरी तरह घरानेदार तालीम में डूबा हुआ था जिसमें सुरों की गहराई के साथ तानों का कौशल, सुरों की गमक और घसीटयुक्त व्याख्या और एक-एक सुर को शिल्पी की भांति गढ़ते हुए बजाने का अंदाज खास था। उन्होंने राग मिश्र शिवरंजनी में रूपक ताल तथा सदासुहागन कही जाने वाली रागिनी भैरवी में द्रुत तीन की रचनाओं के जरिए ऑडिटोरियम में सुरों की कलकल करती सरिता का प्रभाव उत्पन्न कर दिया।
नजर आया पं.रामनारायण की सारंगी का अक्स
बृजनारायण के सरोद वादन मे उनके पिता पं.रामनारायण की सारंगी वादन की बारीकियों के साथ परंपरागत तरीके से रागों को प्रस्तुत करने, राग विस्तार तथा राग स्वरूप को दर्शाने में भी अलग-अलग घरानों की झलक उनके वादन को विविधता प्रदान कर रही थी। उनके साथ तबले पर दुर्जेय भौमिक ने संगत की।



 जेकेके में उस्ताद अल्लादिया खां शास्त्रीय संगीत समारोह में प्रस्तुति देते कलाकार।

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