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जेब खाली, ऊपर से देनदारी...विकास करेगा कौन
डूंगरसिंह राजपुरोहित - जयपुर
शहर के विकास के जिम्मेदार तीनों निकाय जेडीए, हाउसिंग बोर्ड और नगर निगम के खजाने खाली हो चुके हैं। तीनों निकायों का प्रबंधन और प्लानिंग इतनी लचर है कि एक भी बड़े प्रोजेक्ट के लिए इनके पास धन नहीं है। दूसरी तरफ नई सरकार 60 दिन की योजना बना रही है। लेकिन तीनों निकायों की माली हालत ऐसी है कि तीनों पर एक हजार करोड़ रुपए की देनदारियां हैं। लेकिन देनदारियां चुकाने के लिए धन केवल हाउसिंग बोर्ड के पास बचा है।
1982 से शहर के विकास की धुरी बना जेडीए तो इस अवस्था में पहुंच चुका है कि पिछले माह कर्ज लेकर तनख्वाह का भुगतान करना पड़ा। जेडीए ने पिछले छह माह में सड़क कार्यों तक का ठेकेदारों का भुगतान रोक रखा है। नगर निगम के पास एक सड़क बनाने के लिए भी धन नहीं है। पिछले छह माह में चुनावी दबाव के बावजूद निगम क्षेत्र की 70 फीसदी सड़कें जेडीए को बनानी पड़ीं। निगम असल में जेडीए की जमीन नीलामी से मिलने वाली 15 फीसदी राशि पर निर्भर हो गया है।
और ऐसी स्थिति में विकास तो दूर सुधार के काम भी मुस्किल हैं। 60 दिन की कार्य योजना क्या होगी, अंदाजा लगा सकते हैं।
अच्छी प्लानिंग से भर सकते हैं खजाना
निकायों के भूखंडों की नीलामी, लीज राशि का बकाया धन जुटाना, सभी कॉलोनियों के मकानों का नियमितिकरण शुल्क, कन्वर्जन चार्ज, यूडी टैक्स का समय पर कलेक्शन।
धन
त्र55 लाख
देनदारियां
त्र4०० करोड़
नगर निगम
धन
त्र450 करोड़
धन
त्र14 करोड़
देनदारियां
त्र6०० करोड़
देनदारियां
त्र४०० करोड़
हाउसिंग बोर्ड
जेडीए, निगम और हाउसिंग बोर्ड पर १४00 करोड़ की देनदारी
और चुनौती : 60 दिन में ये प्रमुख कार्य कराने हैं
- शहर की संपूर्ण स्वच्छता
- ग्रीन सिटी के लिए गलियों और मुख्य सड़कों, डिवाइडरों पर तथा किनारे पेड़ लगाना
- सड़कों की अधूरी मरम्मत पूरी करना
- प्रशासन शहरों के संग अभियान के तहत कैंप लगाना
- पृथ्वीराज नगर में अवैध निर्माणों को तोडऩा
- जगतपुरा में शूटिंग रेंज का 35 करोड़ का कार्य शुरू करना
- रिंग रोड के लिए 100 हैक्टेयर जमीन अवाप्त करना
- रोड लाइटों को ठीक करना, नई लगाना
- ट्रैफिक के लिहाज से सड़कों पर साइनेज, स्पीड ब्रेकर, जेब्रा क्रॉसिंग के काम कराने।
जेडीए से 40\\\' धन
तो सरकार ले लेती है
जेडीए की आर्थिक स्थिति खराब होने का एक कारण यह भी है कि पिछले दो साल में 100 करोड़ रुपए सरकार को चुकाने पड़े। जेडीए में प्रत्येक भूखंड की नीलामी से प्राप्त धन का 40 फीसदी सरकार को देने का प्रावधान है। इस कारण हर साल औसतन 50 करोड़ रुपए सरकार को देने पड़ते हैं। जबकि पिछले पांच साल से जेडीए की आय का प्रमुख स्रोत ही भूखंडों की नीलामी है। जेडीए वित्त प्रकोष्ठ के अधिकारी रामावतार शर्मा के अनुसार यदि इस राशि से सरकार को 40 फीसदी और निगम को 15 फीसदी भुगतान का नियम हट जाए तो भी कुछ स्थिति सुधर सकती है।
इनका कहना है...
हाउसिंग बोर्ड के पास पैसा नहीं है। बोर्ड के पास कहने को भले ही 450 करोड़ रुपए हैं, लेकिन देनदारियां और कर्जे भी 600 करोड़ रुपए के चुकाने हैं। अगले एक साल में बोर्ड की आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए कई स्तर पर प्लानिंग कर रहे हैं।
-आर वेंकटेश्वरन,
कमिश्नर, राजस्थान हाउसिंग बोर्ड