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बाघिन मछली को ढूंढने के लिए पर्याप्त कैमरे और मैनपॉवर नहीं
जयपुर - जिस प्रसिद्ध बाघिन मछली की ख्याति देश-दुनिया में फैली है और जिसने रणथम्भौर सहित सरिस्का को आबाद करने में महती भूमिका निभाई, उसे लापता होने के 21 दिन बाद भी वन विभाग उसे ढूंढने में लापरवाही दिखा रहा है। मछली ((टी-16)) को खोजने के लिए महज पांच अतिरिक्त कैमरे और 25 लोगों का स्टाफ लगाया गया है। जबकि फरवरी 2005 में टी-5 की मौत के बाद उसके शावकों को ढूंढने के लिए करीब 50 कैमरे और 100 से ज्यादा स्टाफ की टीम तैनात की। इस गहन सर्च अभियान में सफलता भी मिली और नन्हें शावकों का पता भी लगा। लेकिन दुर्भाग्य से मछली का पता लगाने के लिए विभाग ने अभी तक ऐसी गंभीरता नहीं दिखाई।
इस बारे में सवाल करने पर डीएफओ राहुल भटनागर का यह बयान और हैरत में डालने वाला है कि ‘कैमरे लिमिटेड हैं और पार्क में दूसरे टाइगर की मॉनिटरिंग भी तो करनी है। ..जितने कैमरे लगाने हैं, उतने लगा रखे हैं।’ जानकारों का कहना है कि मछली बूथ खोरा के पास घाटी के एक नाले में होने की संभावना है, बार-बार विभाग भी यहीं पर पगमार्क मिलने पर उन्हें मछली के ही होने की संभावना जता रहा है। लेकिन साथ में यह भी जोड़ता है कि जब तक फोटो नहीं आ जाती, तब तक पूरी तरह भरोसा नहीं जताया जा सकता। दूसरी ओर फोटो लेने के लिए कैमरों की ही पर्याप्त व्यवस्था नहीं कर रखी।
लापता होने के 21 दिन बाद भी वन विभाग ढूंढने में लापरवाह