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डाउनलोड करेंजयपुर. एक डोर पर डेढ़ सौ पतंगों को आसमान में लहरा देने वाले पतंगसाज बाबू खां के चले जाने से शहर के पारंपरिक पतंगोत्सव की रौनक लंबे समय तक निश्चित रूप से फीकी पड़ जाएगी। बुधवार को अलसुबह संस्कृतिकर्मी संदीप भूतोडिय़ा से जब उनके निधन का समाचार मिला तो सबसे पहले दिमाग में सवाल कौंधा कि अब कौन थामेगा डेढ़ सौ पतंगों की डोर?
शहर में पर्यटन विभाग की ओर से आयोजित किए जाने वाले पतंगोत्सव में बाबू खां आकर्षण का केंद्र रहते थे। अभी इसी महीने 16 जनवरी को उन्होंने जलमहल की पाल पर आयोजित पतंगोत्सव में खराब तबीयत के बावजूद अपने चिर परिचित अंदाज में पतंगों की डोर थामी। इसी दिन राजस्थान फोरम की ओर से मूर्तिकार अंकित पटेल, अर्जुन प्रजापति, चित्रकार सुरेंद्र पाल जोशी और शाकिर अली ने उनका शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया। इस मौके पर भी उनकी पतंगबाजी के खूब चर्चे भी हुए, तब लग ही नही रहा था कि यह सम्मान उनके जीवन का अंतिम सम्मान बनकर रह जाएगा।
जयपुर ने पहली बार में ही दिल लूटा
बाबू खां की पतंगबाजी कला के प्रचार प्रसार में बरसों लगे कला मर्मज्ञ विनोद जोशी ने बताया कि बाबू खां बरेली के रहने वाले थे, इस वजह से पतंग की डोर और मांझे से उनका गहरा रिश्ता था। बाबू खां कहा करते थे कि पंद्रह वर्ष की उम्र में वो किसी कारण से जयपुर आए थे उस समय गुलाबी नगर की आब-ओ-हवा ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वो यहीं के होकर रह गए। यहां आने के बाद उन्होंने पतंग बनाने की एक बार कोशिश की तो पहली बार में ही इनाम मिल गया, बस उसके बाद डोर, मांझा और पतंग उनके जीवन का प्रमुख अंग बन गए। चूंकि पतंग का हवा से गहरा नाता है इसलिए मारुति नंदन हनुमानजी उनके प्रिय किरदार थे। उन्होंने अपनी पतंगों में हनुमानजी के रूपों को चित्रित कर हवा में लहराया। इसके अलावा हवामहल, आगरे का किला, ताजमहल और चारों धर्मों के प्रतीक चिन्हों को भी उन्होंने पतंगों पर अपनी कलात्मक अभिव्यक्तिका माध्यम बनाया।
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