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हस्तशिल्प उत्सव में हास्य कवियों ने गुदगुदाया
भास्कर न्यूज - जोधपुर
एक ही मंच पर देश के जाने माने कवियों ने कविताओं के माध्यम से देश की मौजूदा
परिस्थितियों का सजीव चित्रण किया। मौका था पश्चिमी राजस्थान उद्योग हस्तशिल्प उत्सव में आयोजित विराट कवि सम्मेलन का, जिसमें हास्य कवियों ने जहां अपनी छोटी-छोटी पंक्तियों के माध्यम से सभी को गुदगुदाया वही वीररस के कवियों ने देशप्रेम का संचार कर दिया।
ञ्च दलबदलू को देख कर पत्नी
आपा खोय...
एक दलबदलू नेता पर लिखी हास्य कविता से शुरूआत करते हुए हास्य कवि प्रदीप चौबे ने खूब वाह वाही लूटी। उन्होंने कविता सुनाई, ‘दलबदलू को देखकर पत्नी आपा खोय, अब के दल बदला तो मैं बदलूंगी तोय।’
ञ्च भिखारी के माध्यम से बयां की देश की व्यवस्था
हास्य रस के कवि धमचक मुल्तानी ने शादी व उसकी परंपराओं पर कई व्यंग्य कहे। उन्होंने फिल्मी गानों पर भी व्यंग्य प्रस्तुत कर खूब हंसाया। इसके अलावा देश में फैल रहे भ्रष्टाचार व इंस्पेक्टर राज को एक भिखारी पर चित्रित कविता के माध्यम से बयां की। इससे पूर्व कवयित्री पूनम वर्मा ने प्रेम रस के गीत गाकर तालियां बटोरी।
ञ्च...वरना सीमा पार तिरंगा लेकर जाता
गीतकार जगदीश सोलंकी ने अपनी कविताओं व रचनाओं के माध्यम से देशभक्ति व देश के शहीदों की व्यथा का चित्रण किया। उन्होंने इस कविता से संदेश दिया ‘हौसला था, लेकिन सांसें धोखा दे गई। वरना सीमा पार तिरंगा लेकर जाता मैं...।’ एक गीत भी सुनाया, ‘हमने उन पर गीत लिखे, वो गीतों में न समा पाए। वे सरहद पर तो चले गए, लेकिन लौटकर ना आए।’
ञ्च मालिक बेटे तो मेहमान हैं बेटियां...
कवयित्री ममता शर्मा ने कन्या भू्रण हत्या रोकने का संदेश देते हुए एक कविता का वाचन किया। जिसमें उन्होंने कहा ‘सच में अभागे है वो लोग, जिनके घर बेटियां नहीं होती। घर के मालिक है बेटे तो , मेहमान हैं बेटियां...’ उन्होंने कविता के माध्यम से मीरा व कान्हा के प्रेम का चित्रण किया। कार्यक्रम के दौरान राकेश शर्मा व रवि सुराणा ने भी प्रेमरस की कविताओं को प्रस्तुत किया।
ञ्च वीर रस की कविताओं से गूंजा पंडाल
वीररस से जुड़ी कविताओं के माध्यम से जम राजस्थानी कवि विनीत चौहान ने प्रस्तुतियां दी तो पूरा पांडाल भारत माता के जयकारों से गूंज उठा। उन्होंने पांच जवानों का सिर कटने की घटना पर बिहार के कृषि मंत्री के बयान कि जवान तो मरने के लिए ही पैदा है पर व्यंग्य कविता बोलते हुए कहा कि ‘हम मरने के लिए पैदा होते है और बिहार के नेता चारा चरने के लिए पैदा होते है। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि संपत सरल ने सुविधाएं बढऩे के बाद बंट रहे परिवारों पर गद्य पढ़ा।