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डाउनलोड करेंजोधपुर। आज के अभिभावक बच्चों को केवल सुविधाओं में तोलकर उनकी एनर्जी और दिमागी क्षमताओं को उग्र स्वभाव में बदलने का काम कर रहे हैं। इससे बच्चे अपनी उम्र और लेवल से बड़े काम कर कहीं प्रशंसा के पात्र बनते हैं तो कहीं प्रशंसा घटनाओं में बदल जाती है। जोधपुर शहर में पिछले दिनों दस वर्षीय बच्चे द्वारा सड़क पर सफारी दौड़ा देने के हादसे के बाद शहर की महिलाओं ने ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए बच्चों का ध्यान घर में ही केंद्रित करने के लिए उन्हें क्वालिटी टाइम देने को ही सबसे बड़ा साधन बताया। इसमें बच्चों को सुनने व समझने, उनकी उम्र व योग्यता के हिसाब से सुविधाएं प्रदान करने, उनसे भी सलाह लेने को खास बताया। दैनिक भास्कर कार्यालय में बच्चों की परवरिश को लेकर आयोजित टॉक शो में शहर की प्रबुद्ध महिलाओं ने इसी तरह के विचार व्यक्त किए।
अंजलि नागपाल ने कहा कि सबसे पहले तो बच्चों के सामने उन्हें बच्चा ना समझें और उनके साथ फ्रेंडली बिहेवियर कर उनसे हर बात को समझदारी से शेयर करें। इससे दूसरी बेकार बातों पर उनका ध्यान नहीं जाएगा। नीतू खंडेलवाल ने कहा कि आज पैरेंट्स बच्चों को सुविधाएं मुहैया करवा कर समझ रहे हैं कि उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई जो गलत है। बच्चों को सुविधाएं देने के साथ उनके व्यवहार पर बराबर नजर रखकर जागरूक करते रहें।
मीनाक्षी भाटी ने कहा कि आज पैरेंट्स बच्चों को लेकर जहां एडवांस हुए हैं, वहीं वे बच्चे की क्वालिटी जाने बिना ही दूसरे से तुलना कर उसे निराश करने का काम करते हैं। इससे वह दूसरी चीजों में अपनापन ढूंढऩा शुरू कर देता है। उन्हें क्वालिटी टाइम देकर उनकी क्वालिटी को निखारें जिससे वे पढ़ाई के बाद अपने टैलेंट को उभारने में उलझे रहें।
राखी बोड़ा ने कहा कि बच्चे तो पहले के दौर में भी थे, लेकिन आज के दौर में बच्चों को पढ़ाई और इंटरनेट तक सीमित कर पैरेंट्स ने उन्हें दिमागी तौर पर फ्री कर दिया है। इससे उनका ध्यान सीमित क्षेत्रों तक ही रह गया है। उन्हें घर के कार्यों से जोडऩे से उनकी सोच को कई नई दिशाएं मिलेंगी।
मोनिका कलवानी ने कहा कि बच्चों को केवल टेक्नोफ्रेंडली बना कर ही उनके बचपन को बर्बाद नहीं करें। उन्हें कम उम्र में गाड़ी या मोबाइल फोन देकर हमें खुश नहीं होना चाहिए। उन्हें सही--गलत बता कर हर बात और मुद्दों में उनकी भी सलाह लें, उनसे पूछकर काम करें जिससे वे अपनी समीक्षा स्वयं करना सीख जाएंगे।
रेखा गुप्ता का कहना था कि आज बच्चों को उनके लेवल से ज्यादा सुविधाएं दी जा रही हैं लेकिन उनका कार्य सीमित हो गया है। जिससे अभिभावकों की ना सुनना उन्हें पसंद नहीं हैं। ऐसे में उनकी एनर्जी उग्र रूप में बाहर आती है। इसलिए उनका ध्यान छोटी-छोटी जिम्मेदारियों में लगाएं।
फलपुष्पा वर्मा ने कहा कि कहीं न कहीं पैरेंट्स की भी गलतियां हैं कि वे अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बच्चों को नजरअंदाज करना शुरू कर देते हैं। इससे वे गलत चीजों को ही अपना दोस्त बना लेते हैं। पूजा लालवानी का कहना था कि पैरेंट्स बच्चों को खुश रखने के चक्कर में उन्हें गलत करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। उन्हें उम्र के अनुसार माहौल दें और अनुशासन के साथ उनकी सीमाएं भी प्यार से समझाएं।
पूर्णिमा सुराणा ने कहा कि बच्चों को सही राह दिखाने के लिए संयुक्त परिवार से अच्छी कोई टेक्निक नहीं। लेकिन अब अभिभावकों के साथ बच्चे भी सच्चे रिश्तों से दूर होकर फेस बुक में रिश्तों को ढूंढेंग़े तो गलत ही हासिल करेंगे। संगीता नारंग ने कहा कि अभिभावक सबसे बड़ी गलती तो ये करते हैं कि उन्हें बच्चा समझकर उनके सामने गलतियां करते रहते हैं। वे उन्हें नोट कर दोहराते रहते हैं। इसलिए बच्चों को सही राह दिखाने और अच्छे संस्कार देने के लिए पहले पैरेंट्स स्वयं को सुधारें। तब बच्चा अपने आप ही गलत काम नहीं करेगा।
प्रेमलता जैन ने कहा कि आज स्कूली पढ़ाई के अलावा मॉरल वैल्यू से जुड़ा स्टडी मेटेरियल बच्चों को नहीं दिया जाता है। अगर ऐसा हो तो वे सही-गलत को अच्छी तरह समझ सकेंगे। चंचल कंवर और नंदिनी शर्मा ने कहा कि ज्यादा प्यार और छोटी-छोटी बातों पर उन्हें डांटना भी उन्हें मनमर्जी करने पर मजबूर करता है। उन्हें गलत बात पर डांटने के साथ उसके बुरे परिणाम बताएं जिससे वे आपकी बात को खुशी से स्वीकार करेंगे।
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