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डाउनलोड करेंकोटा। कोटा-झालावाड़ रोड की इंद्रप्रस्थ औद्योगिक क्षेत्र से लगी 380 हैक्टेयर वन भूमि किसी भी हालत में उद्योगों और भामाशाह मंडी को नहीं दी जाएगी। पिछले 20 वर्षों से यह प्रस्ताव राज्य सरकार के पास विचाराधीन था। अभी तक जनप्रतिनिधि उद्यमियों को यह जमीन दिलाने के नाम पर झूठे आश्वासन देते आ रहे थे।
यह खुलासा बुधवार को पुरुषार्थ भवन में आयोजित पत्रकार वार्ता में कोटा व्यापार महासंघ के महासचिव एवं दी एसएसआई एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अशोक माहेश्वरी ने किया। उन्होंने बताया कि यह भूमि इंद्रप्रस्थ औद्योगिक क्षेत्र के रोड नंबर सात से कोटा बाईपास के बीच में स्थित है।
कलेक्टर के यहां आयोजित बैठक के निर्णय अनुसार इस बाईपास के दोनों ओर वन भूमि पर ग्रीन बेल्ट बनाया जाना निश्चित हुआ था। इसके बाद उत्तर दिशा में आने वाले संपूर्ण वन क्षेत्र को तथा दक्षिण दिशा में आने वाले एक किलोमीटर की परिधि में दीवार बनाकर बंद कर दिया जाएगा। इसमें पौधरोपण जल एवं मृदा संरक्षण कार्य कराए जाएंगे। इसके लिए सीआईसी में भी राशि जमा करा दी गई है। यह निर्णय 2 दिसंबर 2007 एवं 7 दिसंबर 2007 की बैठकों में हुआ है।
प्रशासन और जनप्रतिनिधि दे रहे थे आश्वासन
पिछले 20 वर्षों से उठाई जा रही मांग अब कभी भी पूरी नहीं होगी। आश्चर्य की बात तो यह है कि राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर बार-बार यह बात दोहराई जाती रही है कि इस वन भूमि को औद्योगिक विस्तार और भामाशाह मंडी के विस्तार के लिए दिया जाना प्रस्तावित है। महासंघ ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री को भेजी गई कार्ययोजना के तहत स्टोन पार्क, सेज, नया एयरपोर्ट, नया औद्योगिक क्षेत्र, भामाशाह मंडी, आयात-निर्यात जोन, एग्रो फूड पार्क का विस्तार आदि की योजनाएं थीं। इनके लिए जब जमीन की आवश्यकता का आंकलन किया तो करीब 3000 से 4000 बीघा जमीन इन विकास कार्यों के लिए जरूरी है।
प्रशासन और जनप्रतिनिधि दे रहे थे आश्वासन
पिछले 20 वर्षों से उठाई जा रही मांग अब कभी भी पूरी नहीं होगी। आश्चर्य की बात तो यह है कि राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर बार-बार यह बात दोहराई जाती रही है कि इस वन भूमि को औद्योगिक विस्तार और भामाशाह मंडी के विस्तार के लिए दिया जाना प्रस्तावित है। महासंघ ने पिछले दिनों मुख्यमंत्री को भेजी गई कार्ययोजना के तहत स्टोन पार्क, सेज, नया एयरपोर्ट, नया औद्योगिक क्षेत्र, भामाशाह मंडी, आयात-निर्यात जोन, एग्रो फूड पार्क का विस्तार आदि की योजनाएं थीं। इनके लिए जब जमीन की आवश्यकता का आंकलन किया तो करीब 3000 से 4000 बीघा जमीन इन विकास कार्यों के लिए जरूरी है।
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