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आखिर क्यों छिपाई जाती है पुरस्कार की सूची?

8 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज.कोटा
गणतंत्र दिवस व स्वतंत्रता दिवस पर सम्मानित होने वालों के नाम एक दिन पहले सार्वजनिक करने से भी अब प्रशासन झिझकने लगा है। पिछले कई समारोहों से यह परंपरा शुरू हो गई है कि आयोजन से पहले की आधी रात तक नामों को सार्वजनिक नहीं किया जाता। शनिवार को भी आधी रात को ७२ नामों की घोषणा की गई।
नामों का खुलासा नहीं करने के पीछे उन पर आपत्ति आने या जिनके नाम नहीं आए उनकी सिफारिश का डर है। सरकारी सेवा में रहते हुए आउट स्टेंडिंग कार्य करना, सामाजिक उत्थान, समाज सेवा या साहसिक कार्य करने के लिए व्यक्तिगत तथा संस्थाओं को जिला स्तरीय, राज्य स्तरीय व राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार दिए जाते हैं। राज्य स्तर व राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार पाने वालों के नाम की घोषणा तो एक सप्ताह पहले तक हो जाती है, लेकिन जिला स्तरीय पुरस्कार के नाम को लेकर जरूरत से ज्यादा गोपनीयता बरती जाती है।
प्रशासनिक अधिकारी तर्क देते हैं कि नामों का खुलासा होते ही सिफारिश करने वालों की लाइन लग जाती है। जिन आवेदकों का नाम छंटनी में बाहर हो जाता है वो ही अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार सिफारिश करवाने में जुट जाते हैं। ऐसे में कई बार तो अधिकारियों को सिफारिश माननी भी पड़ती है और एनवक्त पर सूची बदल जाती है। इससे बचने के लिए सूची को गोपनीय रखा जाता है। वहीं दूसरी ओर समाज सेवा से जुड़े तथा पुरस्कार ले चुके लोगों का कहना है कि नामों पर आपत्ति आने लग जाती है। कुछ ऐसे नाम भी शामिल कर लिए जाते हैं जो शुद्ध रूप से सिफारिशी होते हैं। उनके विरोध की आशंका बढ़ जाती है।




ऐसे होता है आवेदन

सामाजिक कार्यों के लिए पुरस्कार लेने के लिए संस्था या व्यक्ति को जिला कलेक्टर के समक्ष आवेदन करना होता है। जिसमें किए गए कार्यों व प्रशंसा पत्रों के दस्तावेज के साथ-साथ अन्य संस्थाओं के अनुशंसा पत्र भी लगाने होते हैं। सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों के मामले में विभागाध्यक्ष की अनुशंसा होनी चाहिए।

ऐसे होती है स्क्रीनिंग

आवेदन के बाद उनकी छंटनी होती है। एडीएम स्तर के ३ अधिकारियों की कमेटी आवेदकों की कार्यप्रणाली, किए गए कार्य, उनका आचरण, आपराधिक रिकॉर्ड, पब्लिक इमेज जैसे बिंदुओं पर जांच करती है। सरकारी कर्मचारी-अधिकारी के मामले में उनकी कार्यप्रणाली व गबन आदि बिंदुओं को भी शामिल किया जाता है।

॥पुरस्कार की सूची जानबूझकर लेट नहीं की जाती है। स्क्रीनिंग में वक्त लग जाता है। एक बार सूची तैयार होने के बाद भी उसकी जांच की जाती है। इसलिए एक दिन पहले तक अंतिम सूची बन पाती है।’

- गिर्राज वर्मा, एडीएम सिटी