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इतनी अव्यवस्था की मुक्तिधाम में भी नहीं मिलती शांतिशहर में एक को छोड़कर किसी भी मुक्तिधाम में किसी में भी नहीं हैं ठीक प्रकार की सुविधा, कहीं जंगली जानवरों का आतंक तो कहीं सफाई नहीं, जर्जर...
भास्कर न्यूज - कोटा
किसी अपने का हमेशा के लिए बिछुड़ जाना ही झकझोर देने के लिए काफी है। उसके ऊपर से जब अंतिम संस्कार के लिए मुक्तिधाम में पहुंचने पर जो झेलना पड़ता है, उससे तो अपने आप पर धिक्कार महसूस होता है। टूटे टीनशेड के बीच बारिश में बुझती चिता, इधर-उधर घूमते आवारा जानवरों से अपने मासूम के शव को बचाने की जद्दोजहद और फिर नल की टोटियों के नीचे जमी गंदगी की मोटी परतें। यही सब मिलता है कोटा के ज्यादातर मुक्तिधामों में। ऊपर से नगर निगम कहता है कि उससे तो मुक्तिधामों के संरक्षण की जिम्मेदारी ही छीन ली है और यूआईटी की दलील है कि उसके पास तो बस 3 ही मुक्तिधाम हैं। यानी कि दोनों ही एजेंसियां संवेदनहीन हो गई हैं।
अंतिम यात्रा में साथ आए लोग भी पूरा दाह संस्कार होने तक एक घड़ी शांति से बैठने के लिए जगह ही तलाशते रहते हैं। निकट संबंधी और पड़ोसी पहले ही व्यवस्था करके जाते हैं कि सीढिय़ों या पट्टियों को साफ करने के लिए तौलिया चाहिए। टूटे टीनशेड के बीच सब यही दुआ करते रहते हैं कि अंतिम संस्कार के बीच बारिश न आ जाए। एक-दो नहीं शहर के छावनी, विज्ञाननगर, केशवपुरा, रामपुरा, नयापुरा, भीमगंजमंडी, कंसुआ व रंगपुर रोड स्थित मुक्तिधाम सभी के ऐसे ही हाल हैं। छावनी मुक्तिधाम की हालत तो इतनी बदतर हो चुकी है कि स्थानीय लोगों को बुधवार को उग्र आंदोलन करना पड़ा। शहर में अभी १२ मुक्तिधाम हैं और इनमे से ८ की हालत बहुत खराब है। बचे हुए ४ की स्थिति भी कुछ खास अच्छी नहीं है।