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राजनीति: बिना चले, धक्काप्लेट हो गईं सिटी बसें

7 वर्ष पहले
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भास्कर न्यूज - कोटा
लंबे इंतजार के बाद कोटा को नगरीय परिवहन के लिए 34 लो-फ्लोर बसें तो मिलीं, लेकिन वे भी राजनीति में फंस गईं। कांग्रेस सरकार ने चुनावी फायदा लेने के लिए बिना ड्राइवर-कंडक्टरों की व्यवस्था किए बसें खरीद लीं और मंत्री ने लोकार्पण कर दिया। अब सरकार बदल गई और कोटा से तीनों विधायक भाजपा के चुने गए, लेकिन एक ने भी 60 दिन की कार्ययोजना में इन बसों को शामिल नहीं करवाया। भाजपा सरकार को 50 दिन पूरे हो गए, लेकिन इन बसों के बारे में किसी ने नहीं सोचा। 32 बसें चार महीने से रोडवेज के डिपो में खड़ी हैं। इनमें से आधी की बैटरियां अब खराब हो चुकी हैं। ऊपर से चमचमाती एक बस तो डिपो के बीच मैदान में बंद हो गई और अब वहीं खड़ी है। बारिश और धूल के बीच धीरे-धीरे बसों की रबर और लोहे पाट्र्स के भी गलने की आशंका जताई जा रही है।
३१ बसें तो डेढ़ महीने से स्टार्ट भी नहीं हुई
कुन्हाड़ी वर्कशॉप में गुरुवार को 31 लो-फ्लोर बसें व दो ग्रामीण सेवा की बसें खड़ी थी। एक बस आरजे-20 पीए-6637 मैदान के बीच में खड़ी थी। वहां मौजूद कर्मचारी राधेमोहन व हैडगार्ड गिर्राज ने कहा कि इसकी बैटरी बंद हो गई। यहां खड़ी बसों में से आधी से ज्यादा की बैटरी खराब हो चुकी है। पहले तो इन बसों को रोज बदल-बदलकर निकाला जाता था, लेकिन डेढ़ महीने से सब ऐसे ही खड़ी हैं।



चमचमाती हुई यह बस अब धक्के से स्टार्ट हो रही है।

एक बस में ये हो सकता है खराब

बुश, ऑयल सील

रबर और प्लास्टिक के कई आइटम इस्तेमाल नहीं होने पर सख्त होकर खराब हो जाते हैं।

४ टायर

कीमत: ७० हजार

एक जैसी स्थिति में खड़े रहने पर इनकी कोटिंग खराब हो जाती है।

रबर

नई बस में रबर की पेकिंग पर हजारों खर्च होते हैं, ये खुले में खराब हो जाते हैं।

बॉडी

धूप और नमी की वजह से रंग उडऩे लगता है और जंग भी लग सकती है।

बैटरी

कीमत: ८ हजार

१५ दिन तक इस्तेमाल नहीं होने पर सूखने लगती है।

बिना ड्राइवर-कंडक्टर नहीं चल सकती बसें

बसों का संचालन नगर निगम को करना था, लेकिन तत्कालीन सरकार ने जिम्मेदारी रोडवेज को दे दी। रोडवेज प्रशासन को भी मंत्री व अधिकारियों के दबाव में जिम्मेदारी ओढऩी पड़ी। अब बिना ड्राइवर-कंडक्टरों के इन्हें चलाने में रोडवेज को भी परेशानी आ रही है।

कांग्रेस शासन में तत्कालीन प्रमुख शासन सचिव जीएस संधू बसों के संचालन को लेकर 2009 से झांसा देते रहे। जोधपुर व कोटा के लिए बजट में बीस करोड़ रुपए का प्रावधान किया, लेकिन बसों की खरीद में ही चुनाव नजदीक आ गए।

ऐन पहले लोकार्पण

तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने चुनावी फायदे के लिए तुरत-फुरत में 10 करोड़ रुपए खर्च कर सितंबर में बसें मंगवा ली और आचार संहिता से एन पहले इनका लोकार्पण भी कर दिया। लेकिन, न तो ड्राइवर-कंडक्टरों की कोई व्यवस्था की और न इनको परमिट दिलाने का प्रयास किया। नई बसों की हालत भी राजहंस बसों की तरह होने लगी है। दो को छोड़ बाकी रोडवेज के कुन्हाड़ी स्थित वर्कशॉप की शोभा बढ़ा रही हैं।

चार साल तक देते रहे झांसा, चुनाव आए तब खरीदीं



अधिकारियों ने बता दिया था सरकार को

रोडवेज के जोनल मैनेजर टीएन यादव कह रहे हैं कि विधानसभा चुनावों की आचार संहिता लागू होने वाली थी, इसलिए व्यवस्था किए बिना ही इन बसों का संचालन शुरू कर दिया। सरकार को पहले ही बता दिया था कि यहां चालक-परिचालक नहीं हैं। वैसे अभी तक इन बसों के लिए परमिट की भी व्यवस्था नहीं हो पाई।