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अनकही को सुनना भी महत्वपूर्ण

8 वर्ष पहले
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अधिकतर देखा गया है कि जो हमारा इरादा होता है हम वैसा बोल नहीं पाते हैं। हमारे विचार ठीक से अभिव्यक्ति नहीं हो पाते। कई बार हम अच्छे से जानते हैं कि हमें बोलना क्या है, लेकिन फिर भी मूल विषय के दाएं-बाएं ही अपने शब्द फेंकते रहते हैं। जैसे अच्छा तीरंदाज निशाने के इधर-उधर तीर फेंकता रहे। इसके पीछे चार कारण होते हैं। सामने वाले को बुरा न लग जाए, अपन कहीं नासमझ या बेवकूफ न मान लिए जाएं और अपने ही विचार पर सही या गलत होने का संदेह। चौथी बात शब्दों को लेकर लापरवाही की आदत ही पड़ गई हो। यदि ऐसा है तो हमें सावधान होना पड़ेगा। जो कहना चाहिए वह नहीं कह पा रहे हैं तो यह हमारे व्यक्तित्व का दोष है। चलिए आज विचार करें कि जब ऐसे व्यक्तियों से हमारा सामना हो, तब हम क्या करें? हमें अपने भीतर एक खूबी निखारनी चाहिए और वह है अनकही को सुनना। आप पाएंगे कि जानवर अनकही को भी सुनता है। मनुष्य इसमें चूक जाता है। अभ्यास करें सामने वालों के शब्दों के अर्थ को ही न पकड़ें, बल्कि पीछे के इशारों, संकेतों को भी समझें। किसी के भीतर क्या चल रहा है यह पकडऩा सीखें। वह क्या बोल रहा है यह दूसरी बात है, क्योंकि कभी-कभी अनकही, जो कहा जा रहा है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी की अनकही को पकडऩा है तो एक प्रयोग करें। वार्तालाप के दौरान प्रेमपूर्ण हो जाएं। जितना आप प्रेम से भरे होंगे, उतना ही आप दूसरे को बोलने का मौका दे पाएंगे। यदि सामने वाला घुमाना भी चाहेगा, तब भी आप अनकही की गूंज सुन लेंगे।
-पं. विजयशंकर मेहता - द्धह्वद्वड्डह्म्द्गद्धड्डठ्ठह्वद्वड्डठ्ठञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व
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