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प्रैक्टिकल परीक्षा तो बहाना, मोटी रकम या कीमती गिफ्ट के लिए आते हैं कोटा

7 वर्ष पहले
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कोटा। एसीबी द्वारा बुधवार को ब्यावर राउमावि के प्रिंसिपल रामदेव चौधरी की घूस के साथ गिरफ्तारी यह बयां करने के लिए काफी है कि एजुकेशन सिस्टम में कितना भ्रष्ट हो चुका है। चौधरी पर आरोप है कि उन्होंने बोर्ड की प्रैक्टिकल परीक्षा में अच्छे अंक देने के लिए इटावा के स्कूल संचालकों से करीब 65 हजार घूस ली थी। गुरुवार को जब भास्कर ने पूरे मामले की पड़ताल की तो पता चला कि प्रैक्टिकल में नंबर बढ़ाने का धंधा कई सालों से बेहिसाब चल रहा है।

माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की ओर से 12 वीं बोर्ड परीक्षा के प्रेक्टिकल में ज्यादातर एक्सटर्नल एग्जाम लेने नहीं, गाढ़ी कमाई करने आते हैं। प्रदेश में कोटा इनका पसंदीदा एरिया रहता है। बोर्ड से भी ये लोग सांठ-गांठ कर कोटा में प्रेक्टिकल परीक्षा लेने की ड्यूटी लगवाते हैं। मनचाहा नंबर देने के पावर के चलते इन एक्सटर्नल को निजी विद्यालय संचालक भी मोटी रकम देने से नहीं चूकते। संचालकों के स्कूल में प्रैक्टिकल लैब की सुविधा हो या न हो उनके छात्रों को अच्छे नंबर जरूर मिल जाते हैं। इससे उनके स्कूल की प्रतिष्ठा बनी रहती है।

नकद की ज्यादा मांग

रिटायर्ड डीईओ ((माध्यमिक)) नसरत उल्ला कुरैशी बताते है कि प्रेक्टिकल में अच्छे अंक के लिए कहीं घूस कैश में तो कहीं काइंड में दी जाती है। ऐसा काफी सालों से चल रहा है। घूस में नकद की मांग ज्यादा है। कई एक्सटर्नल कोटा डोरिया की साडिय़ां, सोफासेट, एलसीडी, कैमरा, सोने की टॉप्स और अंगूठी तक ले जाते हैं। जबकि इन्हें बस-ट्रेन के टीए और तनख्वाह के अनुसार डीए माध्यमिक बोर्ड से मिलते हैं।

प्रैक्टिकल परीक्षा की गाइड लाइन के अनुसार प्राइवेट स्कूलों में समुचित लैब, लैब सहायक और लैब ब्वाय नहीं होते हैं। इसलिए वहां के बच्चों को प्रैक्टिकल का ज्ञान नहीं होता। घूस लेने की परंपरा 1990 के बाद से शुरू हुई है। 10 साल पहले मोबाइल, अटैची और अन्य आइटम देते थे। प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ आ जाने से अब कैश चल रहा है। ये स्कूल बच्चों से एडमिशन के समय प्रैक्टिकल के नाम पर पैसे ले लेते हैं। बोर्ड को पहले की तरह अतिरिक्त प्रमुख परीक्षक लगाना चाहिए। ताकि परीक्षा में पारदर्शिता हो।

घूस की परंपरा 1990 से

-घूस मामले की जांच के लिए इटावा के प्रिंसिपल रामप्रसाद पारोलिया को जांच अधिकारी नियुक्त किया है। सोमवार को जांच कंप्लीट कर उच्चाधिकारियों को भेजेंगे।-गंगाधर मीणा, एडीईओ (माध्यमिक)

-यदि प्राइवेट स्कूल संचालकों से एक्सटर्नल एक्जामिनर किसी भी तरह की डिमांड करते हैं तो वो प्राइवेट स्कूल वेलफेयर सोसायटी को शिकायत कर सकते हैं।-संजय शर्मा, महामंत्री प्राइवेट स्कूल वेलफेयर सोसायटी

एक्सटर्नल के पास खूब पावर

प्रैक्टिकल परीक्षा 30 नंबर की होती है। इन नंबर की पूरी पावर एक्जामिनर के पास रहती है। जिसमें मौखिक परीक्षा भी शामिल है। वो कैसे नंबर देंगे, उनकी मर्जी पर निर्भर है।

अधिकतम रेट की सीमा नहीं

प्रैक्टिकल में प्रति सब्जेक्ट रेट तय हो जाती है। कम से कम 400 रुपए प्रति छात्र और अधिकतम राशि कुछ भी तय नहीं होती है। प्रति छात्र कुछ भी पैसे लिए जा सकते हैं।

30 में से 28, 29 और 30 नंबर देने का होता है ठेका

एक्सपर्ट बताते है कि प्रैक्टिकल के नाम पर प्रति सब्जेक्ट अच्छे अंक देने का ठेका हो जाता है। प्रैक्टिकल के 30 अंकों में से 28, 29 और 30 नंबर देने की बात तय होती है।