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कहीं धमाकों ने तो नहीं रोक लिया दूर के परिंदों को

7 वर्ष पहले
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राजसमंद - राजसमंद झील कभी प्रवासी पक्षियों का ठौर था, लेकिन धीरे-धीरे प्रवासी पक्षियों की आवक और ठहराव कम हो रहा है। विशेषज्ञ व पर्यावरण प्रेमी मार्बल खदानों में होने वाले विस्फोट और कभी कम बारिश को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं।
इन पक्षियों में आई खासी कमी
पक्षीविदों का कहना है कि वर्ष 1996 तक झील में मध्य एसिया का रोजी पेलिकन, फ्लेमिंगो, देसी पक्षी कुर्जा, जागिल ((लौह सारंग)) बड़ी तादात में आते थे। 1996 में तो पैलिकन व फ्लेमिंगो के जोड़ों के साथ छोटे बच्चे भी देखे गए थे।



2000 से 2005 तक नहीं आए पक्षी

वर्ष 1996 में बारिश कम होने से झील में पानी की कमी होना शुरू हो गई। 2000 से 2005 तक झील बिल्कुल सूख गई। इस दौरान यहां प्रवासी पक्षियों को नहीं देखा गया। उसके बाद धीरे धीरे फिर से कुछ पक्षी आने शुरू हुए। लेकिन वातावरण सही नहीं मिलने से वह ज्यादा दिन प्रवास नहीं करते हैं।

यह हैं यहां के प्रवासी पक्षी

यहां प्रवासी पक्षियों में मुख्य रूप से पोचार्ड, पैलिकन ((हवा सील)), फ्लेमिंगो ((राजहंस)) जो मध्य एशिया से राजसमंद झील तक का सफर करते हैं। वहीं देसी पक्षियों में कुरजा बड़ी संख्या में यहां आते हैं, जो लगभग तीस दिन का प्रवास करते हैं। कुरजा यहीं प्रजनन भी करती है। देसी डुगडुगी, गरट, सुरखाब, नीलकंठ, गजपांव, गौरैया, सारस, जलकाग और साइबेरियन सारस प्रमुख हैं।



वातावरण तैयार करना होगा

॥पक्षियों को विस्फोट से अधिक खतरा रहता है। अगर इनका प्रवास यहां लम्बे समय तक करवाना है तो विस्फोटों की आवाज में कमी लानी होगी। साथ ही पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा।

रजा तहसीन, पक्षी विद

जागरूकता बढ़ानी होगी

॥राजसमंद झील में देसी विदेशी करीब 60 से अधिक प्रजाति के पक्षी दो से तीन माह के प्रवास के लिए आते रहे हैं। कुछ वर्ष से पक्षियों का आना कम हुआ है। इसमें वातावरण में आई कमी, विस्फोट, मोबाइल टावर तथा झील में जल स्तर कम ज्यादा होना प्रमुख कारण रहे हैं।

दिनेश श्रीमाली, पर्यावरणविद