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टूटने की कगार पर खड़ा थाईलैंड

8 वर्ष पहले
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केविन रैफर्टी

प्लेनवड्र्स मीडिया के

एडिटर इन चीफ

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यिंगलक शिनावात्रा की सरकार और विपक्षी पार्टियों की राजनीति से लोकतंत्र को खतरा



बैंकॉक की सड़कों पर हजारों लोगों की भीड़ प्रधानमंत्री यिंगलक शिनावात्रा की सरकार के इस्तीफे की मांग कर रही है। वे अपने आंदोलन को जनक्रांति की संज्ञा देते हैं। उनके हाथ में विशाल राष्ट्रीय झंडे होते हैं। इतने बड़े कि उनके नीचे प्रदर्शनकारियों की पचास कतारें समा जाएं। सुश्री यिंगलक द्वारा संसद जल्द भंग करने और अगले माह चुनाव कराने के निर्णय के बाद से जोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं। हिंसा भड़कने की आशंका के कारण चुनाव आयोग ने सरकार से चुनाव टालने के लिए कहा है। सरकार ने इस सुझाव को रद्द कर दिया। यिंगलक की वैधता उस स्थिति में नहीं रहेगी कि संसद भंग रहे और चुनाव न हों।

वर्तमान संकट से यह भी पता लगा है कि थाईलैंड की सभी पार्टियों के राजनेता विनाश को न्योता दे रहे हैं और दावा भी कर रहे हैं कि केवल वे ही लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर राजधानी की सड़कों पर आंदोलन जारी रहता है। भीड़ सरकारी काम में बाधा डालती है तो सेना हस्तक्षेप कर सकती है। फौज अब तक बैरकों में है लेकिन वह चेतावनी भी दे चुकी है। सेना का दखल सबसे खराब विकल्पों में से एक होगा। ऐसी स्थिति एशिया के एक उभरते देश के लिए जबर्दस्त आघात होगी।

थाईलैंड में अपार प्राकृतिक संपदा है। उसका औद्योगिक आधार मजबूत है। आबादी कल्पनाशील और ऊर्जा से भरपूर है। उसे लजीज खान-पान के कारण विश्व का किचन कहा जाता है। खूबसूरत समुद्र तटों और जलवायु की वजह से उसकी पहचान दुनिया के खेल मैदान के रूप में है। उसका कार उद्योग तेज गति से बढ़ रहा है। राजनीतिक उथल-पुथल के कारण यह सब खतरे में है। थाईलैंड के हालात राजनीति और आर्थिक विकास या उसके अभाव की अंतर क्रिया को समझने के लिए शानदार केस स्टडी हो सकते हैं।

पूर्व उपप्रधानमंत्री और डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता सुथेप थागसुबन ने जन असंतोष को हवा दी है। वे कहते हैं, उनकी जनक्रांति देश को नए सिरे से शुरुआत का मौका देगी। उनका वादा है, भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात पुलिस के स्थान पर सिक्यूरिटी वालंटियर्स तैनात किए जाएंगे। नया संविधान लिखा जाएगा जिसमें यिंगलक के निर्वासित भाई थाकसिन शिनावात्रा द्वारा लागू लोक-लुभावन नीतियों पर पाबंदी रहेगी।

सवाल है, सुथेप को किसने अपने-आपको जनता के मसीहा के रूप में पेश करने का अधिकार दिया है? यह जानना दिलचस्प होगा कि उसका उदय कैसे हुआ है। पश्चिमी मीडिया ने थाईलैंड के घटनाक्रम को बैंकॉक स्थित कुलीन लोगों और निर्वासित थाकसिन शिनावात्रा की अगुआई में किसानों, मजदूरों के बीच संघर्ष के रूप में पेश किया है। शिनावात्रा लगातार चुनाव जीतते रहे हैं। थाकसिन और उनकी समर्थक पार्टियों ने पिछले चार चुनाव भारी बहुमत से जीते हैं। चुनावों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ। पानी की तरह पैसा बहाया गया। वैसे, थाई चुनावों में यह सामान्य बात है। 2001 में सत्तारूढ़ होने के बाद थाकसिन ने बड़ी सफाई से गड़बड़ी की थी।

थाकसिन के पास बहुमत तो था, लेकिन देश राजनीतिक तौर पर विभाजित था। बैंकॉक और दक्षिण का बहुत बड़ा हिस्सा उसके खिलाफ था। अदालत के फैसले और सजा की आशंका के कारण थाकसिन निर्वासन में चले गए। वे 2011 में अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव जीते। मोर्चे पर सामने उनकी बहन यिंगलक थीं। थाकसिन के खिलाफ दलील है कि वे लोकतांत्रिक नहीं हैं और उन्होंने शर्मनाक ढंग से लोकतांत्रिक प्रक्रिया को तोड़ा-मरोड़ा है। पक्ष में भी कुछ मुद्दे हैं। उन्होंने किसानों को उनकी उपज का अच्छा मूल्य दिलाया। गरीबों की भलाई के काम किए। दूसरी तरफ थाकसिन अपनी कैबिनेट को रबर स्टैंप समझते थे। संसद की अनदेखी करते थे। दक्षिणी इलाकों में स्वायत्तता की मांग करने वाले मुसलमानों की बड़े पैमाने पर हत्याओं का दोषी उन्हें माना जाता है। नशीली दवाओं के खिलाफ थाकसिन के अभियान में 2200 कथित ड्रग डीलर मारे गए। इनमें से कुछ बेकसूर थे। उन पर अपने व्यावसायिक हितों के लिए सत्ता के दुरुपयोग का आरोप है। उन्होंने टेलीकॉम के क्षेत्र में एकछत्र साम्राज्य कायम किया है।

थाकसिन जब अमेरिका की यात्रा पर थे तब सेना ने उनका तख्ता पलट दिया था। इसके साथ थाईलैंड में खतरनाक राजनीतिक हलचल शुरू हो गई। यह पिछले 80 वर्षों में 18वां फौजी विद्रोह था। अलबत्ता, प्रमुख डेमोक्रेट राजनीतिज्ञ कोर्न चाटीकावनजी कहते हैं, थाईलैंड अब फौजी शासन के लिए बेहद पेचीदा हो गया है। इससे मौजूदा आंदोलन में सेना के किसी पक्ष का साथ देने की अनिच्छा को समझा जा सकता है। थाकसिन के विदेश में रहने के कारण विरोधियों को उनके खिलाफ कार्रवाई करने का मौका मिल गया। उनकी पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संपत्ति जब्त कर ली गई। उन्हें कई मामलों में सजा हो गई। अगर वे थाईलैंड लौटते हैं तो जेल की सलाखें उनका इंतजार कर रही हैं।

बाहर रहते हुए भी थाकसिन का थाई राजनीति पर दबदबा है। डेमोक्रेट नेतृत्व की गठबंधन सरकार के दो साल सत्ता में रहने के बाद थाकसिन के समर्थक 2011 में जोरशोर से सत्ता में लौट आए। थाकसिन की बहन यिंगलक शिनावात्रा प्रधानमंत्री बनीं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि थाकसिन बाहर रहकर सरकार चला रहे हैं। वे विदेश में मंत्रियों से मिलते हैं। सिंगापुर में मंत्रियों से ऐसी एक मुलाकात की रिकॉर्डिंग सामने आ गई। इसमें थाकसिन को एक एमनेस्टी बिल के बारे में निर्देश देते बताया गया है। यह विधेयक थाकसिन को एक दोष मुक्त व्यक्ति के रूप में थाईलैंड लौटने का रास्ता तैयार करेगा।

यिंगलक ने संसद के निचले सदन में एमनेस्टी विधेयक पास करा दिया। इसके तहत थाकसिन को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्ति मिल जाएगी। विधेयक के उच्च सदन में अटकने और इसके खिलाफ राजधानी में आंदोलन छिडऩे के बाद यिंगलक ने उस पर बातचीत का ऑफर दिया है। विपक्षी दलों के आक्रोश और हताशा को समझना आसान है। उनके सामने एक ऐसी प्रधानमंत्री हैं जो विदेश से दिशा निर्देश हासिल करती हैं और अपने भाई के समान संसद को गंभीरता से नहीं लेतीं। एक डेमोक्रेट नेता का कहना है, वे अपने भाई की भाषा में बोलती हैं।

प्रधानमंत्री के बारे में विपक्षी नेता यह भी कहते हैं कि वे अपने भाई के समान आक्रामक नहीं हैं। सहज स्वभाव की हैं। कम से कम उन्होंने एमनेस्टी बिल को रोका और बातचीत की इच्छा जताई है। यिंगलक ने पुलिस से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई न करने के लिए भी कहा है। माना जा रहा है कि वे भीड़ के आगे हार मान सकती हैं। बहरहाल, यदि डेमोक्रेट्स और अन्य विपक्षी पार्टियां चुनाव बहिष्कार का अभियान चलाती हैं तो कोई नतीजा नहीं निकलेगा। या तो भीड़ का शासन हो जाएगा या सेना सत्ता संभाल लेगी। दोनों ही स्थितियां थाईलैंड के लिए नुकसानदेह हैं। अगर डेमोक्रेट्स समझदार हैं तो वे यिंगलक और उनके सहयोगियों से बातचीत करेंगे।