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पढऩे के जुनून को चाहिए बस एक किराये का कमरा
भास्कर न्यूज - चित्तौडग़ढ़
आंखों से दुनिया को नहीं देख सकता, लेकिन पढ़ लिखकर कुछ करने का जुनून कॉलेज तक खींच लाया। यह जज्बा देखकर कॉलेज स्टाफ ने ही इस स्टूडेंट को गोद ले लिया। भोजन, पढ़ाई खर्च के साथ रहने के लिए किराया राशि भी देने को तैयार है। फिर भी समस्या दूर नहीं हुई। कारण, इस नेत्रहीन विद्यार्थी को न तो कोई कमरा देने को तैयार है और न कोई संस्था या सरकारी विभाग उसे आश्रय देने को राजी है। वह अभी भी इधर-उधर भटकते हुए आशियाना तलाश रहा है, ताकि परीक्षा तक जिला मुख्यालय पर रह सके।
भूपालसागर क्षेत्र के कानडख़ेड़ा निवासी नेत्रहीन रतनलाल खटीक पुत्र वेणीराम बीए फस्र्ट ईयर का छात्र है। पढऩे के लिए उसे रोज गांव से 80 किमी दूर चित्तौडग़ढ़ पीजी कॉलेज आना पड़ता है। बस से साढ़े तीन घंटे लगते है। इतना ही वापस जाने में। कॉलेज से बस तक ऑटो की यात्रा अलग।
रतन का परिवार उसकी पढ़ाई का खर्च भी वहन नहीं कर सकता। जुलाई में कॉलेज में प्रवेश के दौरान जब कॉलेज स्टाफ दैनिक भास्कर के माध्यम से रतनलाल की परेशानी और जुनून से वाकिफ हुआ तो मदद की ठानी। उसको गोद ले लिया। रहने के लिए कॉलेज छात्रावास रास नहीं आया तो रतनलाल रोज गांव से शहर तक आने-जाने लगा। नेत्रहीन होने से इतने लंबे और दुरूह सफर में पग-पग पर सहारे की जरूरत पड़ती है। अब परीक्षा करीब आने से रोज यह सफर ज्यादा भारी पड़ता जा रहा है। रतन शहर में कमरा किराया लेकर पढ़ाई करे, कॉलेज स्टाफ यह राशि भी देने को तैयार है।
रतनलाल के अनुसार वह कमरा किराया लेने के लिए शहर में खूब घूमा, लेकिन अभी तक कोई रूम देने को तैयार नहीं हुआ। किसी हॉस्टल में जगह के लिए समाज कल्याण अधिकारियों तथा निकटवर्ती अहिंसा नगर में स्थित छात्रावास के चक्कर लगाए, लेकिन वहां भी निराशा हाथ लगी। असल में नेत्रहीन होने से उसे बस ऐसा कमरा चाहिए, जहां से उसे दैनिक क्रियाओं के लिए भी किसी सहारे का मोहताज नहीं होना पड़े। फरवरी आखिर में एग्जाम शुरू होने वाले है। लिहाजा रतन चाहता है कि तब तक शहर में ही रहकर अच्छी तरह से पढ़ाई कर सके।